श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 1: सृष्टि  »  अध्याय 8: महारानी कुन्ती द्वारा प्रार्थना तथा परीक्षित की रक्षा  »  श्लोक 27
 
 
श्लोक
नमोऽकिञ्चनवित्ताय निवृत्तगुणवृत्तये ।
आत्मारामाय शान्ताय कैवल्यपतये नम: ॥ २७ ॥
 
शब्दार्थ
नम:—नमस्कार है; अकिञ्चन-वित्ताय—निर्धनों के धन-स्वरूप को; निवृत्त—भौतिक गुणों की क्रियाओं से सदा परे; गुण—भौतिक गुण; वृत्तये—स्नेह; आत्म-आरामाय—आत्मतुष्ट को; शान्ताय—परम शान्त को; कैवल्य-पतये— अद्वैतवादियों के स्वामी को; नम:—प्रणाम है ।.
 
अनुवाद
 
 मैं निर्धनों के धन आपको नमस्कार करती हूँ। आपको प्रकृति के भौतिक गुणों की क्रियाओं-प्रतिक्रियाओं से कोई सरोकार नहीं है। आप आत्म-तुष्ट हैं, अतएव आप परम शान्त तथा अद्वैतवादियों के स्वामी कैवल्य-पति हैं।
 
तात्पर्य
 यदि जीव के पास कुछ भी न रहे, तो वह समाप्त हो जाता है। अतएव वास्तव में देखा जाय, तो जीव परित्यागी नहीं हो सकता। यदि जीव कुछ त्याग करता है, तो वह कुछ और अधिक महत्त्वपूर्ण उपलब्धि के लिए करता है। एक विद्यार्थी अपनी बाल्यकाल की चपलता का त्याग श्रेष्ठ शिक्षा प्राप्त करने के लिये करता है। एक नौकर अधिक अच्छा काम पाने के लिये अपना काम छोड़ता है। इसी प्रकार एक भक्त इस भौतिक जगत का परित्याग व्यर्थ ही नहीं करता, अपितु कुछ असली आध्यात्मिक उपलब्धि के लिये करता है। श्रील रूप गोस्वामी, सनातन गोस्वामी, श्रील रघुनाथ दास गोस्वामी इत्यादि ने भगवान् की सेवा के लिये ही सांसारिक तडक़- भडक़ का परित्याग किया। सांसारिक दृष्टि से वे महापुरुष थे। ये गोस्वामी बंगाल सरकार में मन्त्री थे और श्रील रधुनाथ दास गोस्वामी अपने समय के बहुत बड़े जमींदार के पुत्र थे, लेकिन उन्होंने अपना सर्वस्व त्याग दिया, जिससे उन्हें इससे श्रेष्ठतर उपलब्धि हो सके। भक्तगण सामान्य रूप से सम्पत्तिविहीन होते हैं, लेकिन भगवान् के चरणकमल उनके गुह्यतम कोषागार हैं। श्रील सनातन गोस्वामी के सम्बन्ध में एक अत्यन्त सुन्दर कथा है। उनके पास एक पारस पत्थर था, जिसे उन्होंने कूड़े के ढेर में छोड़ दिया था। एक जरूरतमन्द व्यक्ति उसे वहाँ से उठा ले गया, किन्तु बाद में वह सोचने लगा कि आखिर इसे ऐसे उपेक्षित स्थान में क्यों छोड़ रखा गया होगा। अतएव उसने सनातन गोस्वामी से सब से कीमती वस्तु का नाम पूछा, तो उन्होंने उसे भगवान् का पवित्र नाम दिया। अकिंचन का अर्थ है निर्धन, अर्थात् जिसके पास देने के लिए भौतिक रूप में कुछ न हो। वास्तविक भक्त या महात्मा किसी को कोई भौतिक वस्तु नहीं देता, क्योंकि वह पहले से सारी भौतिक सम्पत्ति त्याग चुका होता है। लेकिन वह परम धन का अर्थात् भगवान् का दान दे सकता है, क्योंकि भगवान् ही भक्त के वास्तविक धन होते हैं। सनातन गोस्वामी का कूड़े में पड़ा पारस पत्थर, उनका धन न था अन्यथा उसे ऐसे स्थान में रखा न गया होता। यह विशेष उदाहरण नवदीक्षित भक्तों के समक्ष रखा जाता है, जिससे उन्हें विश्वास दिलाया जा सके कि भौतिक लोभ तथा आध्यात्मिक उन्नति साथ-साथ नहीं चलते। जब तक कोई व्यक्ति हर वस्तु को भगवान् के साथ आध्यात्मिक रूप से सम्बन्धित नहीं देखता, तब तक उसे आत्मा तथा पदार्थ में अन्तर दिखता है। श्रील सनातन गोस्वामी जैसे गुरु ने यह उदाहरण हम सब लोगों के लिए प्रस्तुत किया, क्योंकि हममें वैसी आध्यात्मिक दृष्टि नहीं है यद्यपि वे स्वयं प्रत्येक वस्तु को आध्यात्मिक रूप में देखने वाले थे।

भौतिक दृष्टि का विकास या भौतिक सभ्यता आध्यात्मिक उन्नति में एक रोड़े का काम करती है। ऐसा भौतिक विकास जीव को भौतिक शरीर के बन्धन में उलझा देता है, जिसके बाद अनेक भौतिक कष्ट आते रहते हैं। ऐसी भौतिक प्रगति अनर्थ अथवा अवांछित वस्तु कहलाती है। वास्तव में है भी ऐसा ही। वर्तमान समय की भौतिक प्रगति के प्रसंग में पचास सेण्ट अर्थात् आधे डालर दाम वाली लिपस्टिक के प्रयोग का नाम लिया जा सकता है। ऐसी अनेक अवांछित वस्तुएँ हैं, जो देहात्म-बुद्धि से प्रसूत हैं। ऐसी अनेक अवांछित वस्तुओं की ओर मन लगाने से मनुष्य की शक्ति व्यर्थ ही नष्ट होती है और आत्म-साक्षात्कार भी प्राप्त नहीं हो पाता, जो मानव की प्रमुख आवश्यकता है। चन्द्रमा तक पहुँचने के प्रयास दूसरा उदाहरण है, जिसमें शक्ति का अपव्यय होता है, क्योंकि यदि चन्द्रमा तक पहुँच भी लिया जाय, तो भी जीवन की समस्याएँ हल होने वाली नहीं हैं। भगवान् के भक्त अकिंञ्च कहलाते हैं, क्योंकि उनके पास व्यावहारिक रूप से भौतिक सम्पत्ति नहीं होती। ऐसी भौतिक सम्पत्ति प्रकृति के तीनों गुणों का प्रतिफल है। वे आध्यात्मिक शक्ति को व्यर्थ कर देते हैं; अतएव हमारे पास जितनी ही कम भौतिक वस्तुएं होंगी, उतना ही अधिक अवसर हमें आध्यात्मिक प्रगति के लिए प्राप्त हो सकेगा।

पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् का भौतिक कार्यकलापों से किसी तरह का प्रत्यक्ष सम्बन्ध नहीं होता। उनके सारे कर्म जो इस भौतिक जगत में भी प्रदर्शित होते हैं, आध्यात्मिक होते हैं और भौतिक प्रकृति के गुणों से रागविहीन होते हैं। भगवद्गीता में भगवान् कहते हैं कि उनके सारे कर्म, यहाँ तक कि इस जगत में उनका आविर्भाव तथा तिरोधान भी दिव्य होता है और जो इसे ठीक से जान लेता है, वह इस जगत में फिर से जन्म न लेकर भगवद्धाम को वापस जाता है।

भवरोग का कारण प्रकृति पर प्रभुत्व जताने की लालसा है। यह लालसा प्रकृति के तीनों गुणों की अन्त:क्रिया के फलस्वरूप है और न तो भगवान्, न ही भक्तगण ऐसे मिथ्या भोग के प्रति आसक्त होते हैं। अतएव भगवान् तथा भक्त निवृत्त-गुण-वृत्ति कहलाते हैं। पूर्ण निवृत्त-गुण वृत्ति तो परमेश्वर हैं, जो प्रकृति के गुणों द्वारा कभी आकृष्ट नहीं होते, लेकिन जीवों में ऐसी प्रवृत्ति पाई जाती है। इनमें से कुछ भौतिक प्रकृति के मोहाकर्षण में फँस जाते हैं।

चूँकि भगवान् भक्तों की सम्पत्ति हैं और भक्तगण उसी तरह भगवान् की सम्पत्ति हैं, अतएव भक्तगण भी निश्चित रूप से प्रकृति के गुणों से परे होते हैं। यह एक सीधा-सा निष्कर्ष है। ऐसे अनन्य भक्त उन मिश्रित भक्तों से भिन्न हैं, जो दुख तथा दरिद्रता को दूर करने के लिए, या उत्सुकता तथा तर्क के कारण भगवान् के पास आते हैं। अनन्य भक्त तथा भगवान् का एक दूसरे से दिव्य सम्बन्ध होता है। लेकिन अन्यों के लिए भगवान् के पास कुछ लेन-देन नहीं होती, अतएव वे आत्माराम या आत्म-तुष्ट कहलाते हैं। आत्माराम होने के कारण, वे समस्त अद्वैतवादियों के स्वामी हैं, जो भगवान् के अस्तित्व में एकाकार हो जाना चाहते हैं। ऐसे अद्वैतवादी भगवान् के व्यक्तिगत तेज में एकाकार हो जाते हैं, जिसे ब्रह्मज्योति कहते हैं, लेकिन भक्त तो भगवान् की दिव्य लीलाओं में प्रवेश करते हैं, जिन्हें कभी भी भौतिक नहीं मानना चाहिए।

 
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