श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 1: सृष्टि  »  अध्याय 8: महारानी कुन्ती द्वारा प्रार्थना तथा परीक्षित की रक्षा  »  श्लोक 32

 
श्लोक
केचिदाहुरजं जातं पुण्यश्लोकस्य कीर्तये ।
यदो: प्रियस्यान्ववाये मलयस्येव चन्दनम् ॥ ३२ ॥
 
शब्दार्थ
केचित्—कोई; आहु:—कहता है; अजम्—अजन्मा; जातम्—उत्पन्न; पुण्य-श्लोकस्य—महान पुण्यात्मा राजा की; कीर्तये—कीर्ति-विस्तार करने के लिए; यदो:—राजा यदु का; प्रियस्य—प्रिय; अन्ववाये—कुल में; मलयस्य—मलय पर्वत का; इव—सदृश; चन्दनम्—चन्दन ।.
 
अनुवाद
 
 कुछ कहते हैं कि अजन्मा का जन्म पुण्यात्मा राजाओं की कीर्तिका विस्तार करने के लिए हुआ है और कुछ कहते हैं कि आप अपने परम भक्त राजा यदु को प्रसन्न करने के लिए जन्मे हैं। आप उसके कुल में उसी प्रकार प्रकट हुए हैं, जिस प्रकार मलय पर्वत में चन्दन होता है।
 
तात्पर्य
 चूँकि इस भौतिक जगत में भगवान् का प्राकट्य व्यामोह में ड़ालने वाला है, अतएव अजन्मा के जन्म के विषय में विभिन्न मत हैं। भगवद्गीता में भगवान् कहते हैं कि यद्यपि वे सारी सृष्टि के स्वामी तथा अजन्मा हैं, फिर भी वे इस भौतिक जगत में जन्म लेते हैं। अतएव अजन्मा के जन्म से इनकार नहीं किया जा सकता, क्योंकि स्वयं भगवान् ने इस सत्य को प्रतिष्ठित किया है। फिर भी उनके जन्म को लेकर विभिन्न मत प्रचलित हैं। भगवद्गीता में भी इसकी घोषणा हुई है। वे अपनी अन्तरंगा शक्ति से धर्म की स्थापना करने तथा पुण्यात्माओं की रक्षा करने और पापियों का विनाश करने के लिए प्रकट होते हैं। उन अजन्मा के प्राकट्य का यही उद्देश्य है। फिर भी यह कहा जाता है कि पुण्यश्लोक राजा युधिष्ठिर की कीर्ति का विस्तार करने के लिए भगवान् आये। निश्चय ही, भगवान् श्रीकृष्ण सारे विश्व के कल्याण हेतु पाण्डवों का राज्य स्थापित करना चाहते थे। जब संसार में पुण्यात्मा राजा शासन करता है, तो लोग सुखी रहते हैं। जब राजा पापी होता है, तो लोग सुखी नहीं रहते। इस कलियुग में, अधिकांश राजा पापी हैं, अतएव नागरिक भी लगातार दुखी रहते हैं। लेकिन प्रजातन्त्र
में तो पापी नागरिक अपने प्रतिनिधि का चुनाव स्वयं करते हैं, अतएव वे अपने दुख के लिए किसी अन्य को दोष नहीं दे सकते। महाराज नल भी एक महान पुण्यात्मा राजा के रूप में विख्यात थे, लेकिन उनका भगवान् कृष्ण से कोई वास्ता न था, अतएव यहाँ पर कृष्ण द्वारा महिमामंडित किये जाने में महाराज युधिष्ठिर से ही तात्पर्य है। राजा यदु के कुल में जन्म लेकर भगवान् ने उनकी भी कीर्ति बढ़ायी थी। यद्यपि वे यादव, यदुवीर, यदुनन्दन आदि के नाम से विख्यात हैं, फिर भी भगवान् ऐसे ऋण से निर्लिप्त रहते हैं। वे उस चन्दन के समान हैं, जो मलय पर्वत में उगता है। वृक्ष तो कहीं भी और सर्वत्र उगते हैं, लेकिन चन्दन का वृक्ष विशेष रूप से मलय पर्वत के क्षेत्र में उगता है, इसलिए चन्दन तथा मलय पर्वत का नाम परस्पर जुड़ा हुआ है। अतएव निष्कर्ष यह निकलता है कि भगवान् सूर्य के समान सदैव अजन्मा हैं, फिर भी वे उसी प्रकार प्रकट होते हैं, जिस प्रकार सूर्य पूर्वी क्षितिज में उदय होता है। जिस प्रकार सूर्य कभी पूर्वी क्षितिज का ही बनकर नहीं रह जाता, उसी तरह भगवान् किसी के पुत्र नहीं, अपितु वे समस्त वस्तुओं के पिता (जनक) हैं।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥