श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 1: सृष्टि  »  अध्याय 8: महारानी कुन्ती द्वारा प्रार्थना तथा परीक्षित की रक्षा  »  श्लोक 36

 
श्लोक
श‍ृण्वन्ति गायन्ति गृणन्त्यभीक्ष्णश:
स्मरन्ति नन्दन्ति तवेहितं जना: ।
त एव पश्यन्त्यचिरेण तावकं
भवप्रवाहोपरमं पदाम्बुजम् ॥ ३६ ॥
 
शब्दार्थ
शृण्वन्ति—सुनते हैं; गायन्ति—कीर्तन करते हैं; गृणन्ति—ग्रहण करते हैं; अभीक्ष्णश:—निरन्तर; स्मरन्ति—स्मरण करते हैं; नन्दन्ति—हर्षित होते हैं; तव—आपके; ईहितम्—कार्य-कलापों को; जना:—लोग; ते—वे; एव—निश्चय ही; पश्यन्ति—देख सकते हैं; अचिरेण—शीघ्र ही; तावकम्—आपका; भव-प्रवाह—पुनर्जन्म की धारा; उपरमम्—बन्द होना, रोकना; पद-अम्बुजम्—चरणकमल ।.
 
अनुवाद
 
 हे कृष्ण, जो आपके दिव्य कार्यकलापों का निरन्तर श्रवण, कीर्तन तथा स्मरण करते हैं या दूसरों को ऐसा करते देखकर हर्षित होते हैं, वे निश्चय ही आपके उन चरणकमलों का दर्शन करते हैं, जो जन्म-मृत्यु के पुनरागमन को रोकनेवाले हैं।
 
तात्पर्य
 भगवान् श्रीकृष्ण हमारी इस बद्ध भौतिक दृष्टि से नहीं देखे जा सकते। उनका दर्शन पाने के लिए मनुष्य को भगवान् के स्वजात प्रगाढ़ प्रेम से युक्त, भिन्न प्रकार की जीवन-अवस्था का विकास करके अपनी वर्तमान दृष्टि को बदलना होगा। जब श्रीकृष्ण इस धराधाम में सशरीर विद्यमान थे, तो सभी लोग उन्हें पूर्ण पुरूषोत्तम भगवान् के रूप में नहीं देख सके। रावण, हिरण्यकशिपु, कंस, जरासन्ध तथा शिशुपाल जैसे भौतिकतावादी भौतिक सम्पत्ति अर्जित करके उच्च योग्यताधारी व्यक्ति बन गये थे, लेकिन वे भगवान् की उपस्थिति को समझ पाने में असमर्थ थे। अतएव भले ही भगवान् हमारे नेत्रों के सामने उपस्थित क्यों न हों, जब तक हमारे पास अपेक्षित दृष्टि नहीं होती, तब तक उनको देख पाना असम्भव है। यह अपेक्षित योग्यता एकमात्र भक्तिमय सेवा द्वारा उत्पन्न होती है, जिसका शुभारम्भ उचित स्रोत से भगवान् के विषय में श्रवण करने से होता है। भगवद्गीता ऐसा लोकप्रिय ग्रंथ है, जिसे सामान्य लोग सुनते, गाते तथा बारम्बार पढ़ते हैं, लेकिन कभी-कभी ऐसा अनुभव होता है कि ऐसी भक्ति सम्पन्न करनेवाला व्यक्ति भगवान् का साक्षात् दर्शन नहीं कर पाता। इसका कारण यह है कि श्रवण नामक पहली विधि अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है। यदि श्रवण सही स्रोत से किया जाय, तो इसका प्रभाव तुरन्त पड़ता है। सामान्यतया लोग अनधिकृत व्यक्तियों से श्रवण करते हैं। ऐसे अनधिकृत व्यक्ति शैक्षणिक योग्यताओं में भले ही प्रकाण्ड विद्वान हों, किन्तु उनके द्वारा भक्ति के सिद्धान्तों का पालन न किए जाने के कारण उनसे श्रवण करना केवल समय का अपव्यय ही होगा। कभी-कभी मूल पाठ की व्याख्या कलात्मक ढंग से इस तरह की जाती है, जिससे वे अपना खुद का हेतु सिद्ध कर सके। अतएव सर्वप्रथम सक्षम तथा योग्य वक्ता चुनना होगा और तब उससे ही श्रवण करना होगा। जब श्रवण-विधि पूर्ण तथा पक्की हो जाती है, तो अन्य विधियाँ स्वत: ही पूरी हो जाती हैं।
भगवान् के अनेक दिव्य कार्यकलाप हैं और इनमें से हर एक से वांछित फल प्राप्त हो सकता है, बशर्ते कि श्रवण-विधि परिपूर्ण हो। भागवत में भगवान् के कार्यकलाप पाण्डवों के साथ उनके व्यवहार से प्रारम्भ होते हैं। असुरों तथा अन्यों के साथ बर्ताव के सम्बन्ध में भी भगवान् की अन्य अनेक लीलाएं हैं। और दसवें स्कन्ध में उनकी प्रिय गोपिकाओं के साथ ही साथ द्वारका में उनकी अपनी पत्नियों के साथ के व्यवहार का वर्णन है। चूँकि भगवान् परम अवस्था में हैं, अतएव उनके प्रत्येक व्यवहार के दिव्य स्वभाव में कोई अन्तर नहीं है। लेकिन कभी-कभी लोग अनधिकृत श्रवण करते समय, गोपियों के साथ भगवान् के व्यवहार (क्रीड़ाओं) में अधिक रुचि लेते हैं। ऐसी मनोवृत्ति श्रोता के कामुक विचारों की सूचक है। अतएव भगवान् की क्रीड़ाओं का प्रामाणिक वक्ता कभी भी ऐसी बातें सुनाने में उलझता नहीं। मनुष्य को चाहिए कि भगवान् के विषय में प्रारम्भ से ही श्रीमद्भागवत या अन्य शास्त्रों से श्रवण करे। इससे श्रोता को उत्तरोत्तर पूर्णता प्राप्त करने में सहायता मिलेगी। अतएव किसी को यह नहीं सोचना चाहिए कि गोपियों के साथ भगवान् का व्यवहार पाण्डवों के साथ उनके व्यवहार से कम महत्त्वपूर्ण है। हमें यह सदा स्मरण में रखना चाहिए कि भगवान् सदैव समस्त संसारी आसक्ति से परे रहने वाले हैं। उपर्युक्त समस्त आचरणों में वे ही नायक हैं और उनके विषय में या उनके भक्तों या उनके प्रतियोद्धाओं के विषय में श्रवण करना आध्यात्मिक जीवन के लिए अनुकूल है। ऐसा कहा जाता है कि सारे वेद, पुराण इत्यादि भगवान् से हमारे विसरे हुए सम्बन्धों को पुनरुज्जीवित करने के लिए हैं। इन सभी शास्त्रों को सुनना आवश्यक है।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥