श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 1: सृष्टि  »  अध्याय 8: महारानी कुन्ती द्वारा प्रार्थना तथा परीक्षित की रक्षा  »  श्लोक 37
 
 
श्लोक
अप्यद्य नस्त्वं स्वकृतेहित प्रभो
जिहाससि स्वित्सुहृदोऽनुजीविन: ।
येषां न चान्यद्भवत: पदाम्बुजात्
परायणं राजसु योजितांहसाम् ॥ ३७ ॥
 
शब्दार्थ
अपि—यदि; अद्य—आज; न:—हमको; त्वम्—आप; स्व-कृत—अपने आप सम्पन्न; ईहित—सारे कर्म; प्रभो—हे मेरे प्रभु; जिहाससि—त्यागते हो; स्वित्—सम्भवत:; सुहृद:—घनिष्ठ मित्र; अनुजीविन:—दया पर निर्भर; येषाम्—जिनका; न—न तो; च—तथा; अन्यत्—कोई अन्य; भवत:—आपके; पद-अम्बुजात्—चरणकमलों से; परायणम्—आश्रित; राजसु—राजाओं के प्रति; योजित—लगे हुए; अंहसाम्—शत्रुता ।.
 
अनुवाद
 
 हे मेरे प्रभु, अपने सारे कर्तव्य स्वयं पूरे कर दिये हैं। आज जब हम आपकी कृपा पर पूरी तरह आश्रित हैं और जब हमारा और कोई रक्षक नहीं है और जब सारे राजा हमसे शत्रुता किये हुए हैं, तो क्या आप हमें छोडक़र चले जायेंगे?
 
तात्पर्य
 पाण्डव अत्यन्त भाग्यशाली थे, क्योंकि सौभाग्यवश वे भगवान् की कृपा पर पूरी तरह आश्रित थे। भौतिक जगत में, किसी की दया पर आश्रित होना घोर दुर्भाग्य का चिह्न होता है, लेकिन भगवान् के साथ जहाँ तक हमारे दिव्य सम्बन्ध की बात है, तो जब हम भगवान् पर पूर्ण रूप से आश्रित होते हैं, तब यह हमारा परम सौभाग्य होता है। भौतिक रोग का कारण सबसे सर्वथा स्वतन्त्र बनने का विचार है। लेकिन क्रूर भौतिक प्रकृति हमें स्वतन्त्र नहीं बनने देती। प्रकृति के कठोर नियमों से स्वतन्त्र होने के मिथ्या प्रयास को, प्रयोगात्मक ज्ञान की भौतिक उन्नति माना जाता है। प्रकृति के नियमों से स्वतन्त्र बनने के इस मिथ्या प्रयास के फलस्वरूप सारा ही भौतिक जगत गतिशील है। स्वर्गलोक तक सीधी सीढ़ी तैयार करने के इच्छुक रावण से लेकर वर्तमान युग तक, सभी लोग प्रकृति के नियमों पर विजय पाने का प्रयास कर रहे हैं। अब वे लोग इलेक्ट्रानिक यान्त्रिक शक्ति से सुदूर लोकों तक पहुँचना चाह रहे हैं। लेकिन मानव सभ्यता का सर्वोच्च लक्ष्य भगवान् के मार्गदर्शन में कठिन श्रम करना तथा पूर्ण रूप से उन्हीं पर आश्रित हो जाना है। पूर्ण सभ्यता की चरम उपलब्धि, वीरतापूर्वक कार्य करते हुए, भगवान् पर पूर्ण रूप से आश्रित रहना है। पाण्डव-जन सभ्यता के इस मानक के आदर्श पालक थे। निस्सन्देह वे भगवान् श्रीकृष्ण की सदिच्छा पर पूर्ण रूप से आश्रित थे, लेकिन वे भगवान् पर आश्रित रहनेवाले आलसी परजीवियों जैसे न थे। वे सभी व्यक्तिगत आचरण तथा भौतिक कार्यों में परम योग्य थे। तो भी वे भगवान् के कृपाकांक्षी थे, क्योंकि वे जानते थे कि प्रत्येक जीव अपनी स्वाभाविक स्थिति के कारण आश्रित है। अतएव जीवन की पूर्णता इसी में है कि भौतिक जगत में झूठे ही स्वतन्त्र होने के बजाय, परमेश्वर की इच्छा पर आश्रित रहा जाय। जो लोग झूठे ही भगवान् से स्वतन्त्र रहना चाहते हैं, वे अनाथ कहलाते हैं, जिसका अर्थ है कि उनका कोई संरक्षक नहीं है, किन्तु जो भगवद्-इच्छा पर पूरी तरह से आश्रित रहते हैं, वे सनाथ कहलाते हैं, अर्थात् उनका कोई संरक्षक है। अतएव हमें सदैव सनाथ बनने का प्रयत्न करना चाहिए, जिससे हम इस भौतिक अस्तित्व की प्रतिकूल परिस्थितियों से सुरक्षित रह सकें। बाह्य भौतिक प्रकृति की भ्रामक शक्ति के कारण हम यह भूल जाते हैं कि जीवन की भौतिक दशा अत्यन्त अवांछनीय उलझन है। अतएव भगवद्गीता (७.१९) हमें निर्देश करती है कि अनेकानेक जन्मों के पश्चात् ही कोई भाग्यशाली व्यक्ति इस तथ्य से अवगत हो पाता है कि वासुदेव ही सर्वेसर्वा हैं और जीवन जीने की सर्वश्रेष्ठ विधि यह है कि पूर्ण रूप से भगवान् के शरणागत हुआ जाय। यही एक महात्मा का लक्षण होता है। पाण्डव परिवार के सारे सदस्य गृहस्थ जीवन में महात्मा थे। महाराज युधिष्ठिर इन महात्माओं में अग्रणी थे और महारानी कुन्ती देवी इनकी माता थीं। अतएव भगवद्गीता तथा समस्त पुराण और उनमें से विशेष रूप से भागवतपुराण की शिक्षाएँ अनिवार्यत: पाण्डव महात्माओं के इतिहास से जुड़ी हुई हैं। उनके लिए भगवान् का विछोह वैसे ही था, जैसे मछली का जल से विलग होना। अतएव कुन्ती देवी को ऐसा विछोह वज्रपात-सदृश प्रतीत हुआ। इसीलिए उनकी सारी प्रार्थना भगवान् को अपने साथ रहने के लिए राजी करने के लिए प्रयास है। कुरुक्षेत्र-युद्ध के बाद, यद्यपि सारे शत्रु राजा मारे जा चुके थे, लेकिन उनके पुत्र तथा पौत्र पाण्डवों से निपटने के लिए अभी भी जीवित थे। ऐसा नहीं है कि पाण्डवों को ही ऐसी शत्रुता का सामना करना पड़ा हो, अपितु हम सभी सदा ऐसी स्थिति में रहते हैं। अतएव जीने के लिए सर्वोतम विधि यही है कि भगवदिच्छा पर आश्रित रहा जाय और संसार की सभी आपदाओं से पार पाया जाय।
 
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