श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 1: सृष्टि  »  अध्याय 8: महारानी कुन्ती द्वारा प्रार्थना तथा परीक्षित की रक्षा  »  श्लोक 40
 
 
श्लोक
इमे जनपदा: स्वृद्धा: सुपक्‍वौषधिवीरुध: ।
वनाद्रिनद्युदन्वन्तो ह्येधन्ते तव वीक्षितै: ॥ ४० ॥
 
शब्दार्थ
इमे—ये सब; जन-पदा:—नगर तथा शहर; स्वृद्धा:—समृद्ध; सुपक्व—पूर्ण रूप से पक्व; औषधि—जड़ी-बूटी; वीरुध:—वनस्पतियाँ; वन—जंगल; अद्रि—पहाडिय़ाँ; नदी—नदियाँ; उदन्वन्त:—समुद्र; हि—निश्चय ही; एधन्ते—वृद्धि करते हुए; तव—आपके; वीक्षितै:—देखने से ।.
 
अनुवाद
 
 ये सारे नगर तथा ग्राम सब प्रकार से समृद्ध हो रहे हैं, क्योंकि जड़ी-बूटियों तथा अन्नों की प्रचुरता है, वृक्ष फलों से लदे हैं, नदियाँ बह रही हैं, पर्वत खनिजों से तथा समुद्र सम्पदा से भरे पड़े हैं। और यह सब उन पर आपकी कृपा-दृष्टि पडऩे से ही हुआ है।
 
तात्पर्य
 मानव-सम्पन्नता प्राकृतिक उपहारों से बढ़ती है, न कि विशाल औद्योगिक उद्यमों से। ये विशाल औद्योगिक संस्थान ईश्वरविहीन सभ्यता के प्रतिफल हैं और वे मानव जीवन के कल्याणकारी उद्देश्यों का विनाश करनेवाले हैं। मनुष्य की प्राण-शक्ति को निचोड़ देने वाले इन कष्टप्रद उद्योगों को जितना ही अधिक बढ़ाया जायेगा, जनसामान्य में उतना ही अधिक असन्तोष फैलेगा, भले ही कुछ लोग इस शोषण द्वारा ठाठ-बाट से रह लें। अन्न, वनस्पतियाँ, फल, नदियाँ, रत्नों तथा खनिजों से पूर्ण पर्वत तथा मुक्ताओं से भरे हुए समुद्र—ये सब प्राकृतिक वरदान हैं, जिनकी पूर्ति परमेश्वर के आदेश से होती है और उनकी इच्छा के अनुसार ही प्रकृति उन्हें प्रचुर मात्रा में उत्पन्न करती है या उनका अभाव ला देती है। प्राकृतिक नियम ऐसा है कि मनुष्य इन ईश्वरप्रदत्त वरदानों का लाभ उठाये तथा प्रकृति पर प्रभुत्व जताने के उद्देश्य से शोषण की प्रवृत्ति छोडक़र, सन्तोष धारण करके समृद्ध बने। अपनी भोगवादी लालसा से हम प्रकृति का शोषण जितना अधिक करने का प्रयास करेंगे, ऐसी शोषणकारी प्रवृत्तियों की प्रतिक्रिया द्वारा हम उतने ही अधिक फँसते जायेंगे। यदि हमारे पास प्रचुर मात्रा में अन्न, फल, शाक-सब्जी तथा औषधियाँ हैं, तो फिर कसाई घर चलाने और दीन पशुओं का वध करने की क्या जरूरत है? मनुष्य को पशु वध करने की आवश्यकता नहीं है, यदि उसके पास खाने के लिए प्रचुर अन्न तथा शाक-सब्जी है। नदियों का बहता जल खेतों को उपजाऊ बनाता है और हमारी आवश्यकता से अधिक जल उपलब्ध है। पर्वतों से खनिज तथा समुद्रों से रत्न प्राप्त होते हैं। यदि मानव समाज के पास प्रचुर अन्न, खनिज, रत्न, जल, दुग्ध इत्यादि हो, तो फिर उसे क्या आवश्यकता है कि वह कुछ लाचार मनुष्यों के श्रम पर भयंकर औद्योगिक संस्थानों के पीछे भागता फिरे? लेकिन ये सारे प्राकृतिक उपहार भगवत्कृपा पर निर्भर हैं। अतएव आवश्यकता इस बात की है कि हम भगवान् के नियमों के प्रति आज्ञाकारी बनें और भक्तिमय सेवा के द्वारा मनुष्य-जीवन की पूर्णता प्राप्त करें। कुन्ती देवी के द्वारा किये गये संकेत बिल्कुल सटीक हैं। वे चाहती हैं कि उन पर भगवान् की कृपा-दृष्टि बनी रहे, जिससे प्राकृतिक सम्पन्नता स्थापित रहे।
 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥