श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 1: सृष्टि  »  अध्याय 8: महारानी कुन्ती द्वारा प्रार्थना तथा परीक्षित की रक्षा  »  श्लोक 42
 
 
श्लोक
त्वयि मेऽनन्यविषया मतिर्मधुपतेऽसकृत् ।
रतिमुद्वहतादद्धा गङ्गेवौघमुदन्वति ॥ ४२ ॥
 
शब्दार्थ
त्वयि—आप में; मे—मेरा; अनन्य-विषया—अनन्य; मति:—ध्यान; मधु-पते—हे मधु के स्वामी; असकृत्—निरन्तर; रतिम्—आकर्षण; उद्वहतात्—आप्लावित हो सकता है; अद्धा—प्रत्यक्ष रीति से; गङ्गा—गंगानदी; इव—सदृश; ओघम्—बहती है; उदन्वति—समुद्र को ।.
 
अनुवाद
 
 हे मधुपति, जिस प्रकार गंगा नदी बिना किसी व्यवधान के सदैव समुद्र की ओर बहती है, उसी प्रकार मेरा आकर्षण अन्य किसी ओर न बँट कर आपकी ओर निरन्तर बना रहे।
 
तात्पर्य
 शुद्ध भक्तिमय सेवा की पूर्णता तभी प्राप्त होती है, जब सारा ध्यान भगवान् की दिव्य प्रेममयी सेवा की ओर लगा रहता है। अन्य सारे स्नेह-बन्धनों को छिन्न करने का अर्थ किसी दूसरे से स्नेह जैसे सूक्ष्म भावों का पूर्ण निषेध नहीं होता। ऐसा सम्भव नहीं है। चाहे कोई भी जीव क्यों न हो, उसमें दूसरों के प्रति स्नेह की भावना होती ही है, क्योंकि यह जीवन का एक लक्षण है। इच्छा, क्रोध, लोभ, आकर्षण जैसे जीवन के लक्षणों को विनष्ट नहीं किया जा सकता। केवल इसके उद्देश्य को बदलना होता है। इच्छा को कभी नकारा नहीं जा सकता है, लेकिन भक्तियोग में इच्छा को इन्द्रियतृप्ति के स्थान पर भगवान् की सेवा में लगाना होता है। परिवार, समाज, देश इत्यादि के प्रति तथाकथित स्नेह इन्द्रियतृप्ति की विभिन्न अवस्थाओं के सिवा अन्य कुछ नहीं है। जब इस इच्छा को भगवान् की संतुष्टि के हेतु बदल दिया जाता है, तब यह भक्ति कहलाती है।

भगवद्गीता में हम देख सकते हैं कि अर्जुन अपनी खुदकी इच्छाओं की तुष्टि के लिए ही अपने भाइयों तथा सम्बन्धियों से नहीं लडऩा चाह रहा था। लेकिन जब उसने भगवान् का सन्देश अर्थात् श्रीमद्भगवद्गीता सुनी, तो उसने अपना निर्णय बदल दिया और भगवान् की सेवा की। ऐसा करने के कारण वह भगवान् का विख्यात भक्त बन गया, क्योंकि सारे शास्त्रों में घोषित किया गया है कि भगवान् से मित्रता भाव में अर्जुन ने भक्तिमय सेवा के द्वारा आध्यात्मिक पूर्णता प्राप्त की। युद्ध हो रहा था, मित्रता भी चल रही थी, वहाँ पर अर्जुन था तथा कृष्ण भी वहाँ पर थे, लेकिन भक्तिमय सेवा के कारण अर्जुन सर्वथा भिन्न व्यक्ति बन गया। अतएव कुन्ती की प्रार्थनाएँ भी कार्यों में वैसे ही परिवर्तन का संकेत करती हैं। श्रीमती कुन्ती विचलित हुए बिना भगवान् की सेवा करना चाह रही थीं और यही उनकी प्रार्थना थी। यह अनन्य भक्ति (निष्ठा) ही जीवन का परम लक्ष्य है। सामान्य रूप से हमारा ध्यान ऐसी वस्तु की सेवा की ओर विचलित हो जाता है, जो ईश्वर से इतर होती है अथवा भगवान् की योजना में नहीं होती है। जब यह योजना भगवान् की सेवा में बदल जाती है अर्थात् जब भगवान् की सेवा से इन्द्रियाँ शुद्ध हो जाती हैं, तब यह सेवा शुद्ध अनन्य भक्ति कहलाती है। श्रीमती कुन्तीदेवी को इसी पूर्णता की कामना थी और वे भगवान् से इसी के लिए प्रार्थना कर रही थीं।

पाण्डवों तथा वृष्णियों के प्रति उनका स्नेह भक्ति की परिधि से बाहर नहीं है, क्योंकि भगवान् की सेवा तथा भक्तों की सेवा अभिन्न हैं। कभी-कभी भक्त की सेवा भगवान् की सेवा से भी बढक़र होती है। लेकिन यहाँ पर पाण्डवों तथा वृष्णियों के प्रति कुन्तीदेवी का स्नेह पारिवारिक सम्बन्ध के कारण था। भौतिक सम्बन्ध के प्रसंग में यह स्नेह-बन्धन माया का सम्बन्ध होता है, क्योंकि शरीर अथवा मन के सम्बन्ध बहिरंगा शक्ति के प्रभाव के कारण होते हैं। परमात्मा के प्रति स्थापित किये जाने पर आत्मा के सम्बन्ध यथार्थ सम्बन्ध होते हैं। कुन्ती देवी द्वारा पारिवारिक सम्बन्ध छिन्न करने का अभिप्राय यह था कि वे रक्त के सम्बन्ध को छिन्न करना चाह रही थीं। यह रक्त सम्बन्ध भव-बन्धन का कारण है, लेकिन आत्मा का सम्बन्ध स्वतन्त्रता का कारण है। आत्मा से आत्मा का यह सम्बन्ध परमात्मा के साथ सम्बन्ध के माध्यम से स्थापित किया जा सकता है। अँधेरे में देखना कोई देखना नहीं है। लेकिन सूर्यप्रकाश में देखने का अर्थ है सूर्य को देखना तथा इसके अलावा वह सब कुछ भी देखना जो अंधकार में अनदेखा रह गया था। यही भक्ति योग का मार्ग है।

 
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  All glories to saints and sages of the Supreme Lord.
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥