श्रीमद् भागवतम
 
हिंदी में पढ़े और सुनें
भागवत पुराण  »  स्कन्ध 1: सृष्टि  »  अध्याय 8: महारानी कुन्ती द्वारा प्रार्थना तथा परीक्षित की रक्षा  »  श्लोक 44
 
 
श्लोक
सूत उवाच
पृथयेत्थं कलपदै: परिणूताखिलोदय: ।
मन्दं जहास वैकुण्ठो मोहयन्निव मायया ॥ ४४ ॥
 
शब्दार्थ
सूत: उवाच—सूत ने कहा; पृथया—पृथा (कुन्ती) द्वारा; इत्थम्—यह; कल-पदै:—चुने हुए शब्दों द्वारा; परिणूत— पूजित होकर; अखिल—सम्पूर्ण; उदय:—यश; मन्दम्—मन्द-मन्द; जहास—मुस्कराये; वैकुण्ठ:—भगवान्; मोहयन्— मोहित करते हुए; इव—सदृश; मायया—अपनी योगशक्ति के द्वारा ।.
 
अनुवाद
 
 सूत गोस्वामी ने कहा : इस प्रकार भगवान् अपने महिमागान के लिए चुने हुए शब्दों में कुन्तीदेवी के द्वारा की गई प्रार्थना सुनकर मन्द-मन्द मुसकाए। यह मुस्कान उनकी योगशक्ति के समान ही मोहक थी।
 
तात्पर्य
 इस जगत में जो भी वस्तु मोहक होती है, वह भगवान् की अभिव्यक्ति कहलाती है। इस भौतिक जगत् पर प्रभुत्व जताने में प्रवृत्त बद्धजीव भी उनकी योगशक्ति से मोहित होते रहते हैं, लेकिन भगवान् के भक्त भगवान् की महिमा से भिन्न प्रकार से मोहित होते हैं और भगवान् का कृपापूर्ण आशीर्वाद उन्हें प्राप्त होता रहता है। उनकी शक्ति का प्रदर्शन भिन्न प्रकार से होता है, जिस प्रकार कि विद्युत् शक्ति विविध क्षमताओं में कार्य करती है। श्रीमती कुन्ती ने भगवान् की प्रार्थना में उनकी महिमा का मात्र एक अल्पाँश का कथन किया है। उनके सारे भक्त इसी प्रकार से चुने हुए शब्दों से उनकी पूजा करते हैं, और इसी कारण भगवान् उत्तम श्लोक कहे जाते हैं। यद्यपि भगवान् की महिमा का वर्णन चुने हुए शब्दों से कितना ही क्यों न किया जाये, तथापि वह पर्याप्त नहीं है, फिर भी वे ऐसी प्रार्थनाओं से उसी प्रकार तुष्ट हो जाते हैं, जिस प्रकार पिता अपने छोटे से बच्चे की तोतली बोली से प्रसन्न हो जाता है। माया शब्द का प्रयोग भ्रम तथा कृपा दोनों अर्थों में होता है, लेकिन यहाँ पर यह शब्द कुन्तीदेवी पर भगवान् की कृपा के लिए व्यवहृत हुआ है।
 
शेयर करें
       
 
  All glories to Srila Prabhupada. All glories to वैष्णव भक्त-वृंद
  Disclaimer: copyrights reserved to BBT India and BBT Intl.

 
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥