श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 1: सृष्टि  »  अध्याय 8: महारानी कुन्ती द्वारा प्रार्थना तथा परीक्षित की रक्षा  »  श्लोक 46
 
 
श्लोक
व्यासाद्यैरीश्वरेहाज्ञै: कृष्णेनाद्भुतकर्मणा ।
प्रबोधितोऽपीतिहासैर्नाबुध्यत शुचार्पित: ॥ ४६ ॥
 
शब्दार्थ
व्यास-आद्यै:—व्यास इत्यादि मुनियों द्वारा; ईश्वर—सर्वशक्तिमान ईश्वर; ईहा—की इच्छा से; ज्ञै:—विद्वान; कृष्णेन— स्वयं कृष्ण द्वारा; अद्भुत-कर्मणा—अद्भुत कार्य करनेवाले के द्वारा; प्रबोधित:—ढाढस बँधाने पर; अपि—यद्यपि; इतिहासै:—इतिहास के साक्ष्यों द्वारा; न—नहीं; अबुध्यत—संतुष्ट हुए; शुचा अर्पित:—दुखी ।.
 
अनुवाद
 
 अत्यधिक शोक में डूबे हुए राजा युधिष्ठिर, व्यास आदि मुनियों तथा अद्भुत कर्म करनेवाले साक्षात् भगवान् कृष्ण के उपदेशों से तथा समस्त ऐतिहासिक साक्ष्य से सान्त्वना नहीं पा सके।
 
तात्पर्य
 अपने लिए कुरुक्षेत्र के युद्ध में मनुष्यों के सामूहिक रक्तपात से पुण्यात्मा राजा युधिष्ठिर अत्यन्त खिन्न थे। उस समय दुर्योधन सिंहासन पर आरूढ़ था और वह ठीक से शासन चला रहा था। एक तरह से देखा जाये तो युद्ध करने की कोई आवश्यकता न थी। लेकिन न्याय के सिद्धान्त की दृष्टि से युधिष्ठिर को सिंहासन सम्हालना था। सारी राजनीति का केन्द्र-बिन्दु यही था और सारे विश्व के राजा तथा निवासी इन दो प्रतिद्वन्द्वी भाइयों की लड़ाई में उलझ गये। भगवान् कृष्ण भी राजा युधिष्ठिर की ओर थे। महाभारत के आदि पर्व (२०) में कहा गया है कि कुरुक्षेत्र के अठारह दिनों के युद्ध में चौंसठ करोड़ लोग मारे गये और कई लाख लापता हो गये। एक तरह से, विगत पाँच हजार वर्षों में यह विश्व का भिषणतम युद्ध था।

महाराज युधिष्ठिर को मात्र सिंहासन दिलाने के लिए यह सामूहिक वध अतीव मन:संतापी था, अतएव व्यास जैसे मुनियों ने तथा स्वयं भगवान् कृष्ण ने इतिहासों के साक्ष्य से उन्हें यह विश्वास दिलाना चाहा कि यह युद्ध न्यायसंगत था, क्योंकि इसका कारण न्यायसंगत था। लेकिन महाराज युधिष्ठिर संतुष्ट नहीं हुए, यद्यपि उस समय के महान पुरुषों ने उन्हें उपदेश दिया। यहाँ पर कृष्ण को अतिमानवीय कर्म करनेवाले कहे गए हैं, लेकिन इस मामले में न तो व्यास, न ही कृष्ण राजा युधिष्ठिर को सान्त्वना दे पाये। तो क्या इसका अर्थ यह हुआ कि वे अतिमानवीय कर्ता सिद्ध नहीं हो पाये? नहीं, ऐसा कतई नहीं है। इसकी विवेचना यह है कि भगवान् ने ईश्वर के रूप में राजा युधिष्ठिर तथा व्यास दोनों के ही हृदय में स्थित होकर, इससे भी अधिक अतिमानवीय कार्य किया, क्योंकि भगवान् की ऐसी इच्छा थी। राजा युधिष्ठिर के परमात्मा के रूप में उन्होंने राजा को व्यास तथा स्वयं एवं अन्यों के शब्दों से आश्वस्त नहीं होने दिया, क्योंकि वे चाहते थे कि राजा मरणासन्न भीष्मदेव से उपदेश ग्रहण करें, जो भगवान् के एक और महान भक्त थे। भगवान् चाहते थे कि अपने भौतिक अस्तित्व के अन्तिम समय में महान योद्धा भीष्मदेव उनका साक्षात् दर्शन करें और उस समय सिंहासनारूढ़ अपने पौत्रों राजा युधिष्ठिर इत्यादि को देखें और इस तरह वह शान्तिपूर्वक मृत्यु को प्राप्त हों। भीष्मदेव पाण्डवों के विरुद्ध युद्ध करने के कारण तनिक भी प्रसन्न न थे, क्योंकि सारे पाण्डव उनके पितृविहीन पौत्र ही तो थे। लेकिन क्षत्रिय लोग अत्यन्त कठोर होते हैं, अतएव उन्हें दुर्योधन का पक्ष ग्रहण करना पड़ा, क्योंकि दुर्योधन के द्वारा ही उनका भरण-पोषण हो रहा था। इसके अतिरिक्त भगवान् की यह इच्छा भी थी कि राजा युधिष्ठिर भीष्मदेव के वचनों से सान्त्वना पाएँ, जिससे दुनिया देख सके कि भीष्मदेव ज्ञान में सबसे, यहाँ तक कि भगवान् से भी बढक़र थे।

 
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