श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 1: सृष्टि  »  अध्याय 8: महारानी कुन्ती द्वारा प्रार्थना तथा परीक्षित की रक्षा  »  श्लोक 47

 
श्लोक
आह राजा धर्मसुतश्चिन्तयन् सुहृदां वधम् ।
प्राकृतेनात्मना विप्रा: स्‍नेहमोहवशं गत: ॥ ४७ ॥
 
शब्दार्थ
आह—कहा; राजा—राजा युधिष्ठिर ने; धर्म-सुत:—धर्म (यमराज) के पुत्र; चिन्तयन्—सोचते हुए; सुहृदाम्—मित्रों के; वधम्—वध को; प्राकृतेन—भौतिक विचार से; आत्मना—अपने द्वारा; विप्रा:—हे ब्राह्मणो; स्नेह—स्नेह; मोह—मोह; वशम्—के वशीभूत; गत:—गया हुआ ।.
 
अनुवाद
 
 धर्मपुत्र, राजा युधिष्ठिर, अपने मित्रों की मृत्यु से अभिभूत थे और सामान्य भौतिकतावादी मनुष्य की भाँति शोक-सन्तप्त थे। हे मुनियो, इस प्रकार स्नेह से मोहग्रस्त होकर वे बोले।
 
तात्पर्य
 यद्यपि ऐसी अपेक्षा नहीं थी कि महाराज युधिष्ठिर किसी सामान्य मनुष्य की भाँति शोक-संतप्त हो जाएँगे, लेकिन भगवान् की इच्छा ही कहें, वे सांसारिक स्नेह के कारण मोहग्रस्त हो गये(जिस प्रकार अर्जुन मोहग्रस्त हुआ लगता था)। जो मनुष्य समझता है, वह भलीभाँति जानता है कि जीव न तो शरीर है, न मन, अपितु जीवन की भौतिक अवधारणा से परे है। सामान्य मनुष्य हिंसा तथा अहिंसा को शरीर के सम्बन्ध में देखता है, लेकिन यह एक प्रकार का मोह है। प्रत्येक व्यक्ति अपनी वृत्ति के अनुसार कर्तव्य से बँधा
हुआ है। क्षत्रिय को सही निमित्त के लिए विरोधी पक्ष की परवाह न करते हुए युद्ध करना होता है। इस प्रकार कर्तव्य-पालन करते हुए मनुष्य को शरीर के विनाश से विचलित नहीं होना चाहिए, क्योंकि यह शरीर जीवन्त आत्मा का बाहरी पहनावा मात्र है। यह सब महाराज युधिष्ठिर को ज्ञात था, लेकिन भगवान् की इच्छा से वे एक सामान्य मनुष्य जैसे बन गये, क्योंकि इस मोह के पीछे एक दूसरी बहुत बड़ी भावना थी कि राजा को भीष्म उसी प्रकार उपदेश दें, जिस प्रकार स्वयं भगवान् ने अर्जुन को उपदेश दिया था।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥