श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 1: सृष्टि  »  अध्याय 8: महारानी कुन्ती द्वारा प्रार्थना तथा परीक्षित की रक्षा  »  श्लोक 50

 
श्लोक
नैनो राज्ञ: प्रजाभर्तुर्धर्मयुद्धे वधो द्विषाम् ।
इति मे न तु बोधाय कल्पते शासनं वच: ॥ ५० ॥
 
शब्दार्थ
न—कभी नहीं; एन:—पाप; राज्ञ:—राजा का; प्रजा-भर्तु:—प्रजा के पालन में व्यस्त रहनेवाले; धर्म—सही निमित्त के लिए; युद्धे—युद्ध में; वध:—संहार; द्विषाम्—शत्रुओं का; इति—ये सब; मे—मेरे लिए; न—कभी नहीं; तु—लेकिन; बोधाय—संतोष के लिए; कल्पते—वे शासन चलाने के लिए हैं; शासनम्—आदेश; वच:—शब्दों का ।.
 
अनुवाद
 
 जो राजा अपनी प्रजा के पालन में लगा रह कर सही निमित्त के लिए वध करता है, उसे कोई पाप नहीं लगता। लेकिन यह आदेश मेरे ऊपर लागू नहीं होता।
 
तात्पर्य
 महाराज युधिष्ठिर ने सोचा कि, यद्यपि वे वास्तव में राज्य का शासन नहीं चला रहे थे, क्योंकि दुर्योधन द्वारा नागरिकों का बिना किसी क्षति के शासन तो चलाया जा रहा था, फिर भी दुर्योधन के हाथों से राज्य छीनने हेतु
अपने व्यक्तिगत लाभ के लिए उन्होंने इतने सारे जीवों का संहार कराया। यह संहार शासन चलाने के दौरान नहीं हुआ था, अपितु अपने को बड़ा बनाने के लिए हुआ था, अतएव उन्होंने इस पाप के लिए स्वयं को दोषी समझा।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥