श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 1: सृष्टि  »  अध्याय 8: महारानी कुन्ती द्वारा प्रार्थना तथा परीक्षित की रक्षा  »  श्लोक 9

 
श्लोक
उत्तरोवाच
पाहि पाहि महायोगिन् देवदेव जगत्पते ।
नान्यं त्वदभयं पश्ये यत्र मृत्यु: परस्परम् ॥ ९ ॥
 
शब्दार्थ
उत्तरा उवाच—उत्तरा ने कहा; पाहि पाहि—रक्षा करें, रक्षा करें; महा-योगिन्—सर्वोच्च योगी; देव-देव—पूज्यों के भी पूज्य; जगत्-पते—हे ब्रह्माण्ड के स्वामी; न—नहीं; अन्यम्—दूसरा; त्वत्—आपके अतिरिक्त; अभयम्—भय से रहित होने का भाव; पश्ये—देखती हूँ; यत्र—जहाँ; मृत्यु:—मृत्यु; परस्परम्—द्वैत जगत में ।.
 
अनुवाद
 
 उत्तरा ने कहा : हे देवाधिदेव, हे ब्रह्माण्ड के स्वामी, आप सबसे महान् योगी हैं। कृपया मेरी रक्षा करें, क्योंकि इस द्वैतपूर्ण जगत में मुझे मृत्यु के पाश से बचानेवाला आपके अतिरिक्त अन्य कोई नहीं है।
 
तात्पर्य
 यह भौतिक जगत द्वैतपूर्ण है, जबकि परम धाम एकरूप है। द्वैतपूर्ण जगत् पदार्थ तथा आत्मा से निर्मित है जबकि परम जगत पूर्ण रूप से आत्मा है, जिसमें भौतिक गुणों का लेश भी नहीं पाया जाता। इस द्वैतपूर्ण जगत में प्रत्येक व्यक्ति झूठे ही जगत का स्वामी बनने का प्रयास करता है, जबकि परम जगत में भगवान् ही परम प्रधान हैं और अन्य सभी उनके
अनन्य सेवक हैं। द्वैतपूर्ण जगत में प्रत्येक व्यक्ति अन्य सबों से ईर्ष्या करता है और पदार्थ तथा आत्मा के द्वैत अस्तित्व के कारण मृत्यु अपरिहार्य है। शरणागत जीव के लिये भगवान् ही एकमात्र अभयदाता हैं। भगवान् के चरणकमलों की शरण ग्रहण किये बिना कोई भी इस भौतिक जगत में अपने आप को मृत्यु के क्रूर पंजे से नहीं बचा सकता।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥