श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 1: सृष्टि  »  अध्याय 9: भगवान् कृष्ण की उपस्थिति में भीष्मदेव का देह-त्याग  »  श्लोक 11
 
 
श्लोक
पाण्डुपुत्रानुपासीनान् प्रश्रयप्रेमसङ्गतान् ।
अभ्याचष्टानुरागाश्रैरन्धीभूतेन चक्षुषा ॥ ११ ॥
 
शब्दार्थ
पाण्डु—महाराज युधिष्ठिर तथा उनके भाइयों के दिवंगत पिता के; पुत्रान्—पुत्रों को; उपासीनान्—पास ही शान्त बैठे हुए; प्रश्रय—अभिभूत; प्रेम—प्रेमभाव में; सङ्गतान्—एकत्र हुए; अभ्याचष्ट—बधाई दी; अनुराग—प्रेमपूर्वक; अश्रै:— आनन्दाश्रुओं द्वारा; अन्धीभूतेन—आप्लावित; चक्षुषा—नेत्रों से ।.
 
अनुवाद
 
 पास ही महाराज पाण्डु के सारे पुत्र शान्त बैठे थे और अपने मरणासन्न पितामह के प्रेम से अभिभूत थे। यह देखकर भीष्मदेव ने उन्हें भावपूर्ण बधाई दी। उनके नेत्रों में आनन्दाश्रु थे, क्योंकि वे प्रेम तथा स्नेह से आप्लावित हो गये थे।
 
तात्पर्य
 जब महाराज पाण्डु का निधन हुआ, तो उनके सारे पुत्र छोटे बालक थे। अतएव स्वाभाविक था कि वे राज-परिवार के ज्येष्ठजनों के, विशेष रूप से भीष्मदेव के, लाड़-प्यार में पले थे। बाद में जब पाण्डव बड़े हो गये, तो वे धूर्त दुर्योधन तथा उसकी टोली द्वारा ठगे गये। यद्यपि भीष्मदेव जानते थे कि पाण्डव निर्दोष थे और उन्हें व्यर्थ ही कष्ट दिये जा रहे थे, फिर भी राजनीतिक कारणों से वे पाण्डवों का पक्ष नहीं ले पा रहे थे। अपने अन्तिम समय में जब भीष्मदेव ने महाराज युधिष्ठिर समेत अपने यशस्वी पौत्रों को अपनी बगल में बैठे हुए देखा, तो महायोद्धा पितामह अपने प्रेमाश्रुओं को रोक न सके, उनकी आँखों से अश्रु स्वत: छलछला रहे थे। उन्होंने अपने अत्यंत पवित्र पौत्रों द्वारा भोगे गये महान कष्टों का स्मरण किया। निश्चय ही वे सर्वाधिक संतुष्ट व्यक्ति थे, क्योंकि दुर्योधन के स्थान पर युधिष्ठिर सिंहासन पर बैठने जा रहे थे। इसीलिए उन्होंने उन सबों को बधाई दी।
 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥