श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 1: सृष्टि  »  अध्याय 9: भगवान् कृष्ण की उपस्थिति में भीष्मदेव का देह-त्याग  »  श्लोक 19
 
 
श्लोक
अस्यानुभावं भगवान् वेद गुह्यतमं शिव: ।
देवर्षिर्नारद: साक्षाद्भगवान् कपिलो नृप ॥ १९ ॥
 
शब्दार्थ
अस्य—उनकी; अनुभावम्—महिमा; भगवान्—सर्वशक्तिमान; वेद—जानते हैं; गुह्य-तमम्—अत्यन्त गोपनीय; शिव:— शिवजी; देव-ऋषि:—देवताओं में महान ऋषि; नारद:—नारद; साक्षात्—प्रत्यक्ष; भगवान्—भगवान्; कपिल:— कपिल; नृप—हे राजा ।.
 
अनुवाद
 
 हे राजन्, शिवजी, देवर्षि नारद तथा भगवान् के अवतार कपिल—ये सभी प्रत्यक्ष सम्पर्क द्वारा भगवान् की महिमा के विषय में अत्यन्त गोपनीय जानकारी रखते हैं।
 
तात्पर्य
 भगवान् के सारे शुद्ध भक्त भाव हैं अर्थात् ऐसे व्यक्ति हैं, जो दिव्य प्रेममयी सेवा के द्वारा भगवान् की महिमा को जानते हैं। जिस प्रकार भगवान् के पूर्ण रूप के असंख्य विस्तार होते हैं, उसी प्रकार भगवान् के असंख्य शुद्ध भक्त भी हैं जो विभिन्न रसों में सेवा का आदान-प्रदान करने में लगे रहते हैं। सामान्य रूप से भगवान् के बारह महान् भक्त (महाजन) हैं, जिनके नाम हैं—ब्रह्मा, नारद, शिव, कुमारगण, कपिल, मनु, प्रह्लाद, भीष्म, जनक, शुकदेव गोस्वामी, बलि महाराज तथा यमराज। यद्यपि भीष्मदेव इनमें से एक हैं, लेकिन उन्होंने केवल तीन मुख्य नामों का उल्लेख किया है, जो भगवान् की महिमा से अवगत हैं। आधुनिक युग में महान आचार्य श्रील विश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुर का कथन है कि अनुभाव या भगवान् की महिमा, सर्वप्रथम आनन्दविभोर भक्त द्वारा अनुभव की जाती है, जो प्रस्वेद, कम्पन, रुदन, शारीरिक उद्गारों आदि के लक्षणों द्वारा प्रकट होती है और भगवान् की महिमा के लगातार ज्ञान से इन अनुभावों में वृद्धि होती है। भावों के ऐसे ज्ञान का आदान-प्रदान यशोदा तथा भगवान् के मध्य (भगवान् को रस्सी से बाँधना) तथा अर्जुन के साथ प्रेम के आदान-प्रदान के रूप में भगवान द्वारा रथ हाँकने से होता है। भगवान् की इन महिमाएँ अपने भक्तों के समक्ष उनके अधीनस्थ होकर प्रकट की जाती हैं और भगवान् की महिमा का यह एक और लक्षण है। शुकदेव गोस्वामी तथा कुमारगण, दिव्य पद पर स्थित होकर भी, भाव के अन्य गुण द्वारा परिवर्तित होकर भगवान् के शुद्ध भक्त बन गये। भगवान् तथा भक्तों के बीच दिव्य भाव का आदान-प्रदान तब भी होता है, जब भगवान् भक्तों पर विपत्ति ढाते हैं। भगवान् कहते हैं, “मैं मेरे भक्त को संकट में डालता हूँ और इस प्रकार मेरे साथ दिव्य भाव के आदान-प्रदान से भक्त अधिक शुद्ध होता है।” भक्त को भौतिक विपत्तियों में डालकर उसे मायामय भौतिक सम्बन्धों से उद्धार करने की आवश्यकता होती है। ये भौतिक सम्बन्ध भौतिक भोग के आदान-प्रदान पर आधारित हैं और यह भोग भौतिक साधनों पर निर्भर करता है। अतएव जब भगवान् इन भौतिक साधनों को छीन लेते हैं, तब भक्त भगवान् के प्रेमभाव की ओर शत-प्रतिशत आकृष्ट होता है। इस प्रकार भगवान् पतितात्माओं को संसार के कीचड़ से बाहर निकालते हैं। भगवान् द्वारा भक्तों को प्रदत्त विपत्तियाँ पापकर्मों से उत्पन्न विपत्तियों से भिन्न होती हैं। भगवान् की ये सारी महिमाएँ ब्रह्मा, शिव, नारद, कपिल, कुमार तथा भीष्म जैसे महाजनों को ज्ञात रहती हैं, जैसाकि ऊपर उल्लेख हो चुका है और मनुष्य उनकी कृपा से ही इन्हें ग्रहण करने में समर्थ होता है।
 
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