श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 1: सृष्टि  »  अध्याय 9: भगवान् कृष्ण की उपस्थिति में भीष्मदेव का देह-त्याग  »  श्लोक 20
 
 
श्लोक
यं मन्यसे मातुलेयं प्रियं मित्रं सुहृत्तमम् ।
अकरो: सचिवं दूतं सौहृदादथ सारथिम् ॥ २० ॥
 
शब्दार्थ
यम्—व्यक्ति; मन्यसे—सोचते हो; मातुलेयम्—ममेरे भाई को; प्रियम्—अत्यन्त प्रिय; मित्रम्—मित्र; सुहृत्-तमम्— अत्यधिक हितैषी; अकरो:—किया गया; सचिवम्—मन्त्री; दूतम्—दूत; सौहृदात्—शुभ कामना से; अथ—तत्पश्चात्; सारथिम्—सारथी ।.
 
अनुवाद
 
 हे राजन्, तुमने अज्ञानवश ही जिस व्यक्ति को अपना ममेरा भाई, अपना अत्यन्त प्रिय मित्र, शुभैषी, मन्त्री, दूत, उपकारी इत्यादि माना है, वे स्वयं भगवान् श्रीकृष्ण हैं।
 
तात्पर्य
 श्रीकृष्ण यद्यपि पाण्डवों के ममेरे भाई, मित्र, हितैषी, मन्त्री, दूत, उपकारी, आदि बने हुए थे, तो भी वे थे तो पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् ही। अपनी अहैतुकी कृपावश तथा अपने अनन्य भक्तों पर कृपा जताने के लिए वे सभी प्रकार की सेवा करते हैं, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं लगाना चाहिए कि उन्होंने परम पुरुष के रूप में अपना पद बदल दिया है। उन्हें सामान्य पुरुष के रूप में सोचना सबसे बड़ी मूर्खता है।
 
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  All glories to saints and sages of the Supreme Lord.
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥