श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 1: सृष्टि  »  अध्याय 9: भगवान् कृष्ण की उपस्थिति में भीष्मदेव का देह-त्याग  »  श्लोक 21
 
 
श्लोक
सर्वात्मन: समद‍ृशो ह्यद्वयस्यानहङ्‍कृते: ।
तत्कृतं मतिवैषम्यं निरवद्यस्य न क्‍वचित् ॥ २१ ॥
 
शब्दार्थ
सर्व-आत्मन:—प्रत्येक जीव के हृदय में वास करनेवाले का; सम-दृश:—सबों पर समान रूप से दयालु होनेवाले का; हि—निश्चय ही; अद्वयस्य—परम का; अनहङ्कृते:—मिथ्या अहंकार की सारी पहचान से मुक्त; तत्-कृतम्—उनके द्वारा सब कुछ किया गया; मति—चेतना; वैषम्यम्—विषमता, अन्तर; निरवद्यस्य—समस्त आसक्ति से मुक्त हुआ; न—कभी नहीं; क्वचित्—किसी अवस्था में ।.
 
अनुवाद
 
 पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् होने के कारण वे प्रत्येक के हृदय में विद्यमान हैं। वे सबों पर समान रूप से दयालु हैं और भेदाभेद के मिथ्या अहंकार से सर्वथा मुक्त हैं। अतएव वे जो कुछ करते हैं, वह भौतिक उन्माद से मुक्त होता है। वे समदर्शी हैं।
 
तात्पर्य
 चूँकि वे परम पूर्ण हैं, अतएव उनसे कुछ भी भिन्न नहीं है। वे कैवल्य हैं, उनके अतिरिक्त और कुछ नहीं हैं। प्रत्येक वस्तु तथा हर कोई व्यक्ति उनकी शक्ति की अभिव्यक्ति है और इस प्रकार अपनी शक्ति के द्वारा वे सर्वत्र उपस्थित हैं क्योंकि वे उससे अभिन्न हैं। सूर्य की पहचान सूर्य की किरणों के प्रत्येक इंच से तथा किरणों के प्रत्येक सूक्ष्म कण से की जाती है। इसी प्रकार भगवान् अपनी विभिन्न शक्तियों के द्वारा सर्वत्र फैले हुए हैं। वे परमात्मा हैं और परम निर्देशक के रूप में सबों में उपस्थित हैं। अतएव वे पहले से ही समस्त जीवों के सारथी तथा उपदेशक (मन्त्री) हैं। अतएव, जब वे अर्जुन के सारथी के रूप में स्वयं प्रकट होते हैं, तो उनके उच्चस्थ स्थिति में कोई अन्तर नहीं पड़ता। यह तो भक्तिमय सेवा की शक्ति है, जो उन्हें सारथी या दूत के रूप में प्रदर्शित करती है। चूँकि जीवन की भौतिक अवधारणा से उनका कोई सरोकार नहीं रहता, क्योंकि वे परम आध्यात्मिक सत्ता हैं, अतएव उनके लिए कोई कर्म न तो उत्कृष्ट है और न निकृष्ट। पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् होने के कारण उन्हें मिथ्या अहंकार नहीं होता। अतएव वे अपने को किसी वस्तु से भिन्न नहीं मानते। उनमें अहंकार का भाव सन्तुलित रहता है। अतएव वे अपने शुद्ध भक्त के सारथी बनकर अपने को निकृष्ट नहीं मानते। यह तो शुद्ध भक्त की महिमा ही है कि वह अपने प्रिय भगवान् से सेवा करा लेता है।
 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥