श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 1: सृष्टि  »  अध्याय 9: भगवान् कृष्ण की उपस्थिति में भीष्मदेव का देह-त्याग  »  श्लोक 22
 
 
श्लोक
तथाप्येकान्तभक्तेषु पश्य भूपानुकम्पितम् ।
यन्मेऽसूंस्त्यजत: साक्षात्कृष्णो दर्शनमागत: ॥ २२ ॥
 
शब्दार्थ
तथापि—फिर भी; एकान्त—एकनिष्ठ; भक्तेषु—भक्तों में; पश्य—देखो; भू-प—हे राजा; अनुकम्पितम्—कितना दयावान; यत्—जिसके लिए; मे—मेरा; असून्—जीवन; त्यजत:—समाप्त करते हुए; साक्षात्—प्रत्यक्ष; कृष्ण:— भगवान्; दर्शनम्—सामने; आगत:—कृपा करके आये हैं ।.
 
अनुवाद
 
 सबों पर समान रूप से दयालु होते हुए भी वे अब कृपापूर्वक मेरे समक्ष आये हैं, जब में मेरे जीवन का अंत कर रहा हूँ, क्योंकि मैं उनका अनन्य सेवक हूँ।
 
तात्पर्य
 यद्यपि परम भगवान् श्रीकृष्ण समदर्शी हैं, तो भी अपने अनन्य भक्तों के प्रति वे विशेष कृपालु रहते हैं, क्योंकि भक्तगण उन्हीं को अपना रक्षक तथा स्वामी मानकर पूर्णरूपेण उनके शरणागत होते हैं। परमेश्वर को अपना रक्षक, मित्र तथा स्वामी मानकर उनमें अनन्य श्रद्धा रखना शाश्वत जीवन की सहज अवस्था है। सर्वशक्तिमान की इच्छा से जीव इस तरह बनाया गया है कि जब वह पूर्णतया आश्रित रहता है, तब वह सर्वाधिक सुखी होता है।

इसके विपरीत मनोवृति का होना पतन का कारण है। जब जीवात्मा भौतिक जगत् पर प्रभुत्प जताने के लिए अपनी पहचान गलत ठंग से इस प्रकार करता है, मानो कि वह भगवान् से सर्वथा स्वतंत्र है, तब वह पतनशील हो जाता है। सारी कठिनाई की जड़ मिथ्या अहंकार है। मनुष्य को चाहिए कि प्रत्येक दशा में वह भगवान् के प्रति आकृष्ट हो।

भीष्मजी की मृत्यु-शय्या के निकट भगवान् कृष्ण इसीलिए प्रकट हुए, क्योंकि भीष्म उनके अनन्य भक्त थे। अर्जुन का कृष्ण से कुछ शारीरिक सम्बन्ध था, क्योंकि भगवान् उसके ममेरे भाई लगते थे। किन्तु भीष्म से उनका ऐसा कोई सम्बन्ध न था। अतएव आकर्षण का कारण आत्मा से घनिष्ठ सम्बन्ध था। फिर भी चूँकि शारीरिक सम्बन्ध अधिक सुखद तथा स्वाभाविक होता है, इसीलिए भगवान् को जब महाराज नन्द या यशोदा का पुत्र कहा जाता है या राधारानी का प्रेमी कहा जाता है, तो वे अधिक प्रसन्न होते हैं। भगवान् के साथ इस प्रकार का शारीरिक सम्बन्ध होना भी भगवान् की प्रेममय सेवा के आदान-प्रदान का एक और लक्षण है। भीष्मदेव इस दिव्य -भाव की मधुरता से अवगत हैं, इसीलिए वे भगवान् को ‘विजय-सखे’ ‘पार्थ-सखे’ आदि कहकर सम्बोधित करते हैं, ठीक वैसे ही जैसे उन्हें ‘नन्द-नन्दन’ या ‘यशोदा-नन्दन’ कहा जाता है। उनसे दिव्य मधुर सम्बन्ध स्थापित करने का सबसे अच्छा तरीका यह है कि मान्य भक्तों के माध्यम से उन तक पहुँचा जाय। मनुष्य को चाहिए कि उनसे सीधे सम्पर्क स्थापित न करे, अपितु किसी माध्यम के द्वारा उन तक पहुँचे, जो पारदर्शी तथा सही पथ पर ले जाने में समर्थ हो।

 
 
  All glories to saints and sages of the Supreme Lord.
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥