श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 1: सृष्टि  »  अध्याय 9: भगवान् कृष्ण की उपस्थिति में भीष्मदेव का देह-त्याग  »  श्लोक 23
 
 
श्लोक
भक्त्यावेश्य मनो यस्मिन् वाचा यन्नाम कीर्तयन् ।
त्यजन् कलेवरं योगी मुच्यते कामकर्मभि: ॥ २३ ॥
 
शब्दार्थ
भक्त्या—भक्तिपूर्वक; आवेश्य—चिन्तन करके; मन:—मन; यस्मिन्—जिसमें; वाचा—शब्दों से; यत्—कृष्ण का; नाम—पवित्र नाम; कीर्तयन्—कीर्तन करते हुए; त्यजन्—परित्याग करते हुए; कलेवरम्—इस भौतिक शरीर को; योगी—भक्त; मुच्यते—मोक्ष पाता है; काम-कर्मभि:—सकाम कर्मों से ।.
 
अनुवाद
 
 वे पुरुषोत्तम भगवान् जो एकाग्र भक्ति तथा चिन्तन से एवं पवित्र नाम के कीर्तन से भक्तों के मन में प्रकट होते हैं, वे उन भक्तों को उनके द्वारा भौतिक शरीर को छोड़ते समय सकाम कर्मों के बन्धन से मुक्त कर देते हैं।
 
तात्पर्य
 योग का अर्थ है अन्य समस्त विषयों से हटाकर, मन को केन्द्रित करना और वास्तव में ऐसी एकाग्रता समाधि है या भगवान् की सेवा में शत-प्रतिशत अनुरक्ति है। जो इस प्रकार अपने चित्त को एकाग्र करता है, वह योगी कहलाता है। भगवान् का ऐसा योगी भक्त,भगवान् की सेवा में प्रतिदिन चौबीसों घण्टे लगा रहता है। फलस्वरूप उसका सारा ध्यान नवधा भक्ति में भगवान् के चिन्तन में लगा रहता है। नवधा भक्ति में श्रवण, कीर्तन, स्मरण, पूजन, स्तुति, दास्य-भाव, आज्ञा-पालन, सख्य-भाव या समर्पण सम्मिलित हैं। योग के ऐसे अभ्यास से अर्थात् भगवान् की सेवा द्वारा उनसे जुडऩे से भगवान् द्वारा मान्यता मिलती है, जैसाकि समाधि की सर्वोच्च स्थिति का वर्णन करते हुए भगवद्गीता में स्वयं भगवान् व्याख्या करते हैं। भगवान् ऐसे विरले भक्त को योगियों में श्रेष्ठ बतलाते हैं। भगवत्कृपा से ऐसा पूर्ण योगी अपना मन पूर्ण चेतना से भगवान् में एकाग्र करता है और इस प्रकार शरीर त्यागने के पूर्व उनके नाम का कीर्तन करने से वह भगवान् की अन्तरंगा शक्ति द्वारा तुरन्त ऐसे लोक को भेज दिया जाता है, जहाँ भौतिक जीवन तथा उससे सम्बद्ध कारणों का प्रश्न ही नहीं उठता। भौतिक अस्तित्व में जीव को अपने सकाम कर्मों के अनुसार जन्म-जन्मान्तर तीन प्रकार के कष्टों की भौतिक स्थिति को सहना होता है। ऐसा भौतिक जीवन जीव की स्वाभाविक इच्छाओं के ही कारण उत्पन्न होता है। भगवान् की भक्तिमय सेवा से जीव की स्वाभाविक इच्छाओं को मारा नहीं जाता, अपितु वे भक्तिमय सेवा के सही कार्य में लगाई जाती हैं। इससे इच्छाओं के वैकुण्ठ में अंतरित होने की योग्यता आ जाती है। यहाँ पर सेनापति भीष्मदेव यहाँ पर विशेष प्रकार के योग का उल्लेख कर रहे हैं, जिसे भक्तियोग कहते हैं और वे भाग्यशाली थे कि भौतिक शरीर को त्यागने के पूर्व अपने समक्ष साक्षात् भगवान् को उपस्थित देख रहे थे। अतएव अगले श्लोकों में उन्होंने इच्छा व्यक्त की है कि भगवान् उनकी दृष्टि के समक्ष ही बने रहें।
 
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