श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 1: सृष्टि  »  अध्याय 9: भगवान् कृष्ण की उपस्थिति में भीष्मदेव का देह-त्याग  »  श्लोक 36
 
 
श्लोक
व्यवहितपृतनामुखं निरीक्ष्य
स्वजनवधाद्विमुखस्य दोषबुद्ध्या ।
कुमतिमहरदात्मविद्यया य-
श्चरणरति: परमस्य तस्य मेऽस्तु ॥ ३६ ॥
 
शब्दार्थ
व्यवहित—दूर खड़े; पृतना—सैनिकों के; मुखम्—मुँह को; निरीक्ष्य—देखकर; स्व-जन—सम्बन्धीगण; वधात्—मारने से; विमुखस्य—हिचकनेवाले का; दोष-बुद्ध्या—दूषित बुद्धि से; कुमतिम्—अल्पज्ञान; अहरत्—समूल नष्ट किया; आत्म-विद्यया—दिव्य ज्ञान से; य:—जो; चरण—चरणों का; रति:—आकर्षण; परमस्य—परम का; तस्य—उस; मे— मेरा; अस्तु—हो ।.
 
अनुवाद
 
 जब युद्धक्षेत्र में अर्जुन अपने समक्ष सैनिकों तथा सेनापतियों को देखकर अज्ञान से कलुषित हो रहा लग रहा था, तो भगवान् ने उसके अज्ञान को दिव्य ज्ञान प्रदान करके समूल नष्ट कर दिया। उनके चरणकमल सदैव मेरे आकर्षण के लक्ष्य बने रहें।
 
तात्पर्य
 राजाओं तथा सेनापतियों को लडऩेवाले सैनिकों के समक्ष खड़ा होना पड़ता था। वास्तविक युद्ध की प्रणाली यही है। तब राजा तथा सेनापति आज के तथाकथित राष्ट्रपति या रक्षा- मंत्री जैसे नहीं होते थे। जब बेचारे सैनिक या भाड़े के सिपाही एक दूसरे से आमने-सामने लड़ रहे होते थे, तो राजा या सेनापति घर में बैठे नहीं रह सकते थे। यह आधुनिक प्रजातन्त्र का विधान हो सकता है, लेकिन जब वास्तविक राजतन्त्र था तो सम्राट ऐसे नहीं होते थे जो योग्यता पर विचार किये बिना चुने जानेवाले कायरों जैसे हों। जैसाकि कुरुक्षेत्र के युद्धस्थल से स्पष्ट है, दोनों पक्षों के कार्यकारी प्रधान यथा द्रोण, भीष्म, अर्जुन तथा दुर्योधन सोये हुए नहीं थे, वे सभी ऐसे युद्ध में भाग ले रहे थे, जो लोक-आवास के स्थानों से कहीं दूर संपन्न होने जा रहा था। इसका अर्थ यह हुआ कि निर्दोष नागरिक प्रतिद्वंद्वी राजसी दलों के युद्ध के प्रभावों से बचे रहते थे। ऐसे युद्ध में जो कुछ हो रहा होता था, उसे नागरिकों द्वारा देखे जाने की कोई आवश्यकता न थी। उन्हें तो अपनी आय का चौथा भाग शासक को देना होता था, चाहे वह अर्जुन हो या दुर्योधन। कुरुक्षेत्र के युद्ध में दोनों दलों के सेनानायक आमने-सामने खड़े थे। अर्जुन ने उन्हें अत्यन्त करुणा से देखा तथा पछताने लगा कि राज्य-लिप्सा के कारण वह अपने स्वजनों को ही मार डालेगा। वह दुर्योधन द्वारा बनाये गये भयानक सैन्य-व्यूह से रंच भर भी भयभीत नहीं था, लेकिन भगवान् का दयालु भक्त होने के कारण यह स्वाभाविक था कि उसे सांसारिक वस्तुओं से वैराग्य होता, अतएव उसने निश्चय किया कि वह सांसारिक वैभव के लिए युद्ध नहीं करेगा। लेकिन यह तो अल्प ज्ञान के कारण था; इसीलिए कहा गया है कि उसकी बुद्धि कलुषित हो गई थी। उसकी बुद्धि को कभी भी कलुषित नहीं होना चाहिए था, क्योंकि वह भगवान् का भक्त तथा सखा था, जैसा कि भगवद्गीता के चतुर्थ अध्याय से स्पष्ट है। निश्चय ही अर्जुन की बुद्धि कुलषित हो गई थी, अन्यथा देहात्मबुद्धि के द्वारा भौतिक बन्धन में पड़े कलुषित बद्धजीवों के कल्याण के लिए भगवद्गीता का उपदेश देने का अवसर कैसे प्राप्त हुआ होता? भगवद्गीता संसार के बद्धजीवों के उद्धार के लिए सुनाई गई, जिससे वे शरीर को मिथ्या ही आत्मा न मान बैठें और परमेश्वर के साथ आत्मा के नित्य सम्बन्ध को पुन: स्थापित कर सकें। भगवान् द्वारा आत्म-विद्या का प्रवचन, मुख्य रूप से ब्रह्माण्ड के सभी भागों के समस्त व्यक्तियों के लाभ के लिए हुआ था।
 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥