श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 1: सृष्टि  »  अध्याय 9: भगवान् कृष्ण की उपस्थिति में भीष्मदेव का देह-त्याग  »  श्लोक 42
 
 
श्लोक
तमिममहमजं शरीरभाजां
हृदि हृदि धिष्ठितमात्मकल्पितानाम् ।
प्रतिद‍ृशमिव नैकधार्कमेकं
समधिगतोऽस्मि विधूतभेदमोह: ॥ ४२ ॥
 
शब्दार्थ
तम्—उस भगवान् को; इमम्—इस समय जो मेरे समक्ष है; अहम्—मैं; अजम्—अजन्मा; शरीर-भाजाम्—बद्धजीव के; हृदि—हृदय में; हृदि—हृदय में; धिष्ठितम्—स्थित; आत्म—परमात्मा; कल्पितानाम्—शुष्क चिन्तकों का; प्रतिदृशम्— प्रत्येक दिशा में; इव—सदृश; न एकधा—एक नहीं; अर्कम्—सूर्य को; एकम्—केवल एक; समधि-गत: अस्मि—मैं ध्यान में समाधिस्थ हूँ; विधूत—मुक्त होकर; भेद-मोह:—द्वैत की भ्रांत धारणा से ।.
 
अनुवाद
 
 अब मैं पूर्ण एकाग्रता से एक ईश्वर श्रीकृष्ण का ध्यान कर सकता हूँ, जो इस समय मेरे सामने उपस्थित हैं, क्योंकि अब मैं प्रत्येक के हृदय में, यहाँ तक कि मनोधर्मियों के हृदय में भी रहनेवाले उनके प्रति द्वैत भाव की स्थिति को पार कर चुका हूँ। वे सबों के हृदय में रहते हैं। भले ही सूर्य को भिन्न-भिन्न प्रकार से अनुभव किया जाय, किन्तु सूर्य तो एक ही है।
 
तात्पर्य
 भगवान् श्रीकृष्ण ही एक परम भगवान् हैं, लेकिन उन्होंने अपनी अकल्पनीय शक्ति के द्वारा अपने आपको अनेक अंशों में विस्तारित कर रखा है। द्वैतभाव उनकी इस अकल्पनीय शक्ति को न जानने से उत्पन्न होता है। भगवद्गीता (९.११) में भगवान् कहते हैं कि जो मूर्ख हैं, वे ही उन्हेंमात्र मनुष्य मानते हैं। ऐसे मूर्ख व्यक्ति भगवान् की अकल्पनीय शक्ति से अवगत नहीं रहते। वे अपनी अकल्पनीय शक्ति से सबों के हृदय में उसी प्रकार विद्यमान हैं, जिस प्रकार सूर्य संसार भर के लोगों की आँखों के सामने विद्यमान है। भगवान् का परमात्मा रूप उनके पूर्ण अंश का विस्तार है। वे अपनी अकल्पनीय शक्ति से प्रत्येक के हृदय में परमात्मा-रूप में अपना विस्तार करते हैं। वे अपने व्यक्तिगत तेज के विस्तार के द्वारा ब्रह्मज्योति के जाज्वल्यमान तेज के रूप में अपना विस्तार करते हैं। ब्रह्म-संहिता में कहा गया है कि ब्रह्मज्योति उनका व्यक्तिगत तेज है। अतएव उनमें तथा उनके तेज ब्रह्मज्योति या परमात्मा-रूप में उनके पूर्ण अंशों में कोई अन्तर नहीं है। अल्पज्ञानी लोग, जिन्हें इस तथ्य का पता नहीं है, वे बह्मज्योति तथा परमात्मा को श्रीकृष्ण से भिन्न समझते हैं। भीष्मदेव के मन से द्वैतभाव की यह धारणा पूर्ण रूप से मिट जाती है और वे अब सन्तुष्ट हैं कि वे भगवान् श्रीकृष्ण ही हैं, जो सब कुछ हैं। यह अनुभूति महात्माओं या भक्तों को ही प्राप्त होता है, जैसाकि भगवद्गीता (७.१९) में कहा गया है कि वासुदेव ही सर्वेसर्वा हैं और वासुदेव के बिना, किसी का कोई अस्तित्व नहीं है। वासुदेव या भगवान् श्रीकृष्ण ही आदि परम पुरुष हैं, जिसकी पुष्टि अब एक महाजन द्वारा हो रही है, अतएव नवदीक्षितों तथा शुद्ध भक्तों दोनों को समान रूप से उनके चरण-चिह्नों का अनुसरण करने का प्रयास करना चाहिए। भक्ति मार्ग के लिए यही विधि है।

भीष्मदेव के आराध्य, पार्थ-सारथी रूप में भगवान् श्रीकृष्ण हैं और वही कृष्ण वृन्दावन में गोपियों के सर्वाधिक मनोहर श्यामसुन्दर हैं। कभी-कभी अल्पज्ञ अध्येता भूलवश यह सोचते हैं कि वृन्दावन के कृष्ण तथा कुरुक्षेत्र युद्ध वाले कृष्ण पृथक्-पृथक् व्यक्तित्व हैं। लेकिन भीष्मदेव के मन से यह भ्रान्ति पूरी तरह दूर हो चुकी है। यहाँ तक कि निर्विशेषवादियों के लक्ष्य निराकार ज्योति के रूप में कृष्ण ही हैं, और योगियों के लक्ष्य परमात्मा भी कृष्ण हैं। कृष्ण ब्रह्मज्योति तथा अन्तर्यामी परमात्मा दोनों ही हैं, लेकिन ब्रह्मज्योति या परमात्मा में, न तो कृष्ण होते हैं न कृष्ण के मधुर सम्बन्ध। अपने साकार रूप में कृष्ण पार्थसारथी तथा वृन्दावन के श्यामसुन्दर दोनों ही हैं, लेकिन निराकार पक्ष में वे न तो ब्रह्मज्योति में हैं न ही परमात्मा में। भीष्मदेव जैसे महात्मा, श्रीकृष्ण के इन विभिन्न स्वरूपों का अनुभव कर सकते हैं, अतएव वे श्रीकृष्ण को समस्त स्वरूपों का उद्गम जानकर, उन्हीं की पूजा करते हैं।

 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥