श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 1: सृष्टि  »  अध्याय 9: भगवान् कृष्ण की उपस्थिति में भीष्मदेव का देह-त्याग  »  श्लोक 44
 
 
श्लोक
सम्पद्यमानमाज्ञाय भीष्मं ब्रह्मणि निष्कले ।
सर्वे बभूवुस्ते तूष्णीं वयांसीव दिनात्यये ॥ ४४ ॥
 
शब्दार्थ
सम्पद्यमानम्—में लीन होकर; आज्ञाय—इसे जानकर; भीष्मम्—श्री भीष्मदेव के विषय में; ब्रह्मणि—परब्रह्म में; निष्कले—असीम; सर्वे—उपस्थित सभी लोग; बभूवु: ते—वे सब हो गये; तूष्णीम्—मौन; वयांसि इव—पक्षियों की तरह; दिन-अत्यये—दिन के समाप्त होने पर ।.
 
अनुवाद
 
 यह जानकर कि भीष्मदेव अनन्त परम पूर्ण में लीन हो गये, वहाँ पर उपस्थित सारे लोग उसी तरह मौन हो गये, जिस प्रकार दिन समाप्त होने पर पक्षी मौन हो जाते हैं।
 
तात्पर्य
 परम पूर्ण की अनन्त शाश्वतता में प्रविष्ट होना या लीन होने का अर्थ है, जीव के मूल धाम में प्रविष्ट होना। सारे जीव परमेश्वर के परम व्यक्तित्त्व के ही अंश हैं, अतएव वे उनसे सेवक तथा सेव्य भाव से शाश्वत रूप में सम्बन्धित हैं। भगवान् अपने समस्त अंशों द्वारा उसी तरह सेवित हैं, जिस प्रकार पूरी मशीन अपने कल-पुर्जों से संचालित होती है। यदि मशीन का कोई पुर्जा उससे विलग कर दिया जाय, तो उसकी कोई उपयोगिता नहीं रह जाती है। इसी प्रकार भगवान् की सेवा से विलग, उनका कोई भी अंश, व्यर्थ हो जाता है। भौतिक जगत में जितने भी जीव हैं, वे सारे परम पूर्ण से पृथक् हुए अंश हैं और वे मूल अंशों के तुल्य महत्त्वपूर्ण नहीं रह जाते हैं। तथापि कुछ जीव अधिक जुड़े हुए होते हैं, जो नित्य मुक्त होते हैं। भगवान् की भौतिक शक्ति, जिसे दुर्गाशक्ति या बन्दीगृह की अध्यक्षा कहा जाता है, सारे छितराए हुए अंशों का भार अपने ऊपर ले लेती है और इस प्रकार ये जीव प्रकृति के नियमानुसार बद्ध जीवन बिताते हैं। जब जीव को इसका आभास हो जाता है, तब वह अपने घर अर्थात् भगवद्धाम को वापस जाना चाहता है और इस प्रकार जीव में आध्यात्मिक जिज्ञासा जगती है। यह आध्यात्मिक जिज्ञासा ब्रह्म जिज्ञासा कहलाती है। प्रमुख रूप से यह ब्रह्म-जिज्ञासा ज्ञान, वैराग्य तथा भगवद्भक्ति से सफलीभूत होती है। ज्ञान का अर्थ है, परम ब्रह्म अर्थात् परम पूर्ण विषयक प्रत्येक वस्तु का ज्ञान। वैराग्य का अर्थ है भौतिक आसक्ति से विरक्ति और भक्तिमय सेवा जीव की मूल स्थिति के द्वारा अभ्यास किया जाने वाला पुनर्जागरण है। जो सफल जीव परम पूर्ण के राज्य में प्रवेश करने के अधिकारी होते हैं, वे ज्ञानी, योगी तथा भक्त कहलाते हैं। ज्ञानी तथा योगी भगवान् के व्यक्तित्वहीन तेज में प्रविष्ट होते हैं, लेकिन भक्त वैकुण्ठलोक कहे जाने वाले दिव्य लोकों में प्रविष्ट होते हैं। इन दिव्य लोकों में नारायण के रूप में परमेश्वर का आधिपत्य रहता है और स्वस्थ तथा मुक्त जीव दास, सखा, माता-पिता तथा प्रेमी के रूप में भगवान् की प्रेममयी सेवा करते हुए वहाँ रहते हैं। वहाँ मुक्त जीव भगवान् के साथ पूर्ण उन्मुक्तता में रहकर जीवन का आनन्द उठाते हैं, लेकिन निराकारवादी ज्ञानी तथा योगी वैकुण्ठलोक के निर्विशेष तेज में प्रवेश करते हैं। वैकुण्ठलोक का ग्रह सूर्य के समान स्वत: प्रदीप्त रहते हैं और वैकुणठके ग्रहों की किरणें ब्रह्मज्योति कहलाती हैं। इस ब्रह्मज्योति का अनन्त प्रसार रहता है और यह भौतिक जगत इस ब्रह्मज्योति का ढका हुआ एक नगण्य अंश मात्र है। यह आवरण क्षणिक है, अतएव यह एक प्रकार का भ्रम (मोह) है।

भगवान् का शुद्ध भक्त होने के कारण, भीष्मदेव आध्यात्मिक क्षेत्र में वैकुण्ठग्रहों में से एक में प्रविष्ट हुए, जहाँ भगवान् अपने पार्थसारथी रूप में मुक्त जीवों के ऊपर अधिकार जमाये हुए हैं और वे जीव निरन्तर उनकी सेवा में लगे रहते हैं। भगवान् तथा भक्त जिस प्रेम तथा स्नेह से बँधे रहते हैं, वह भीष्मदेव में प्रकट है। भीष्मदेव भगवान् के पार्थसारथी वाले दिव्य स्वरूप को कभी नहीं भूले और जिस समय भीष्मदेव दिव्यलोक को प्रयाण कर रहे थे, तब भगवान् सशरीर उनके समक्ष उपस्थित थे। यह जीवन की सर्वोच्च सिद्धि है।

 
 
  All glories to saints and sages of the Supreme Lord.
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥