श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 1: सृष्टि  »  अध्याय 9: भगवान् कृष्ण की उपस्थिति में भीष्मदेव का देह-त्याग  »  श्लोक 46
 
 
श्लोक
तस्य निर्हरणादीनि सम्परेतस्य भार्गव ।
युधिष्ठिर: कारयित्वा मुहूर्तं दु:खितोऽभवत् ॥ ४६ ॥
 
शब्दार्थ
तस्य—उसका; निर्हरण-आदीनि—दाह संस्कार; सम्परेतस्य—मृत देह का; भार्गव—हे भृगुवंशी; युधिष्ठिर:—महाराज युधिष्ठिर; कारयित्वा—सम्पन्न करके; मुहूर्तम्—क्षण भर के लिए; दु:खित:—दुखी; अभवत्—हुए ।.
 
अनुवाद
 
 हे भृगुवंशी (शौनक), भीष्मदेव के मृत देह का दाह संस्कार सम्पन्न करने के बाद, महाराज युधिष्ठिर क्षण भर के लिए शोकाभिभूत हो गये।
 
तात्पर्य
 भीष्मदेव न केवल महाराज युधिष्ठिर के परिवार के मुखिया थे, अपितु एक महान दार्शनिक और उनके भाइयों एवं माता के लिए मित्र भी थे। चूँकि सबसे ज्येष्ठ युधिष्ठिर समेत पाँच पाण्डवों के पिता महाराज पाण्डु मर चुके थे, अतएव भीष्मदेव ही पाण्डवों के सर्वाधिक वत्सल पितामह और विधवा पुत्रवधू कुन्तीदेवी के संरक्षक थे। यद्यपि महाराज युधिष्ठिर के ताऊ, महाराज धृतराष्ट्र, उनकी देख-रेख के लिए जीवित थे, लेकिन उनका स्नेह सबसे ज्येष्ठ दुर्योधन आदि अपने सौ पुत्रों की ओर अधिक था। अन्ततोगत्वा पाँचों पितृविहीन भाइयों को हस्तिनापुर राज्य के अधिकार से वंचित करने के लिए षड््यन्त्र रचा गया। राजमहलों में सामान्य रूप से जैसा होता है, कपट चाल चली गई और पाँचों भाइयों को वनवास दे दिया गया। लेकिन भीष्मदेव महाराज युधिष्ठिर के प्रति निष्कपट भाव से अपने अन्तिम क्षण तक भी शुभचिन्तक, पितामह, मित्र तथा दार्शनिक बने रहे। वे महाराज युधिष्ठिर को सिंहासन पर बैठा देखकर, खुशी-खुशी मृत्यू को वरण किए, अन्यथा वे पाण्डवों को दिए जा रहे अनुचित कष्टों के कारण अपने कष्टों को सहने के बजाय, बहुत पहले शरीर त्याग कर चुके होते। वे उपयुक्त अवसर की प्रतीक्षा में थे, क्योंकि उन्हें विश्वास था कि कुरुक्षेत्र के युद्ध में पाण्डुपुत्र अवश्य विजयी होंगे, क्योंकि उनके रक्षक श्रीकृष्ण थे। किन्तु भगवद्भक्त होने के कारण वे जानते थे कि भगवान् के भक्त को कभी विनष्ट नहीं किया जा सकता। महाराज युधिष्ठिर को भीष्मदेव की इन सारी शुभेच्छाओं का पता था, अतएव वे अवश्य ही अत्यधिक वियोग का अनुभव कर रहे होंगे। वे इस महान् आत्मा के विछोह से शोकाकुल थे, उनके उस भौतिक शरीर के लिए नहीं, जो भीष्मदेव ने त्यागा था। अन्त्येष्टि क्रिया एक आवश्यक कर्तव्य था, यद्यपि भीष्मदेव मुक्त आत्मा थे। चूँकि भीष्मदेव नि:सन्तान थे, अतएव सबसे बड़े पौत्र, महाराज युधिष्ठिर इस अन्त्येष्टि क्रिया को सम्पन्न करने के समुचित अधिकारी थे। यह भीष्मदेव के लिए वरदानस्वरूप था कि परिवार के समरुप ही एक महान व्यक्ति ने इस महापुरुष के अन्तिम संस्कार सम्पन्न किये।
 
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  All glories to saints and sages of the Supreme Lord.
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥