श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 1: सृष्टि  »  अध्याय 9: भगवान् कृष्ण की उपस्थिति में भीष्मदेव का देह-त्याग  »  श्लोक 48
 
 
श्लोक
ततो युधिष्ठिरो गत्वा सहकृष्णो गजाह्वयम् ।
पितरं सान्‍त्वयामास गान्धारीं च तपस्विनीम् ॥ ४८ ॥
 
शब्दार्थ
तत:—तत्पश्चात्; युधिष्ठिर:—महाराज युधिष्ठिर ने; गत्वा—वहाँ जाकर; सह—साथ; कृष्ण:—भगवान् के; गजाह्वयम्— गजाह्वय, हस्तिनापुर नाम की राजधानी में; पितरम्—अपने ताऊ (धृतराष्ट्र) को; सान्त्वयाम् आस—ढाढस बँधाया; गान्धारीम्—धृतराष्ट्र की पत्नी को; च—तथा; तपस्विनीम्—तपस्विनी ।.
 
अनुवाद
 
 तत्पश्चात् महाराज युधिष्ठिर भगवान् श्रीकृष्ण के साथ तुरन्त ही अपनी राजधानी, हस्तिनापुर गये और वहाँ पर अपने ताऊ धृतराष्ट्र तथा अपनी ताई तपस्विनी गान्धारी को ढाढस बँधाया।
 
तात्पर्य
 धृतराष्ट्र तथा गान्धारी दुर्योधन आदि सौ भाइयों के पिता-माता थे और नाते में वे महाराज युधिष्ठिर के ताऊ-ताई लगते थे। कुरुक्षेत्र के युद्ध के बाद अपने सारे पुत्र-पौत्रों को खो देने से यह यशस्वी दम्पति महाराज युधिष्ठिर के संरक्षण में था। वे इतनी अपार क्षति से उत्पन्न कष्ट से घोर सन्तप्त थे और तपस्वियों का-सा जीवन बिता रहे थे। धृतराष्ट्र के चाचा, भीष्मदेव की मृत्यु इन राजा-रानी के लिए दूसरा गहरा आघात था, अतएव उन्हें महाराज युधिष्ठिर से सान्त्वना की आवश्यकता थी। महाराज युधिष्ठिर को अपने कर्तव्य का ज्ञान था, अतएव वे कृष्ण सहित तुरन्त उस स्थान पर पहुँचे और शोकाकुल धृतराष्ट्र को दयामय शब्दों से अपनी और भगवान् की ओर से सान्त्वना दी।

यद्यपि गांधारी आज्ञाकारिणी पत्नी तथा दयालु माता का जीवन बिता रही थीं, लेकिन वे शक्तिमान तपस्विनी भी थीं। यह भी कहा जाता है कि उन्होंने अपने पति के अन्धत्व के कारण स्वेच्छा से अपनी भी आँखें बन्द कर रखी थीं। पत्नी का कर्तव्य है कि पति का शत-प्रतिशत अनुगमन करे और गान्धारी इतनी पति-परायणा थीं कि पति के निरन्तर अन्धत्व में उनका अनुगमन करती रहीं। अतएव वे अपने कार्यों से महान तपस्विनी थीं। इसके अतिरिक्त अपने सौ पुत्रों तथा पौत्रों के सामूहिक वध से उन्हें अवश्य ही गहरा आघात लगा होगा, जो किसी भी स्त्री के लिए दुस्तर है। लेकिन उन्होंने, तपस्विनी की भाँति, यह सब कुछ सह लिया। स्त्री होते हुए भी गान्धारी का चरित्र भीष्मदेव से किसी तरह कम नहीं था। ये दोनों महाभारत में सुप्रसिद्ध चरित्र हैं।

 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥