श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 1: सृष्टि  »  अध्याय 9: भगवान् कृष्ण की उपस्थिति में भीष्मदेव का देह-त्याग  »  श्लोक 6-7

 
श्लोक
पर्वतो नारदो धौम्यो भगवान् बादरायण: ।
बृहदश्वो भरद्वाज: सशिष्यो रेणुकासुत: ॥ ६ ॥
वसिष्ठ इन्द्रप्रमदस्त्रितो गृत्समदोऽसित: ।
कक्षीवान् गौतमोऽत्रिश्च कौशिकोऽथ सुदर्शन: ॥ ७ ॥
 
शब्दार्थ
पर्वत:—पर्वत मुनि; नारद:—नारद मुनि; धौम्य:—धौम्य; भगवान्—ईश्वर के अवतार; बादरायण:—व्यासदेव; बृहदश्व:—बृहदश्व; भरद्वाज:—भरद्वाज; स-शिष्य:—अपने शिष्यों सहित; रेणुका-सुत:—परशुराम; वसिष्ठ:—वशिष्ठ; इन्द्रप्रमद:—इन्द्रप्रमद; त्रित:—त्रित; गृत्समद:—गृत्समद; असित:—असित; कक्षीवान्—कक्षीवान; गौतम:—गौतम; अत्रि:—अत्रि; च—तथा; कौशिक:—कौशिक; अथ—तथा; सुदर्शन:—सुदर्शन ।.
 
अनुवाद
 
 पर्वत मुनि, नारद, धौम्य, ईश्वर के अवतार व्यास, बृहदश्व, भरद्वाज, परशुराम तथा उनके शिष्य, वसिष्ठ, इन्द्रप्रमद, त्रित, गृत्समद, असित, कक्षीवान्, गौतम, अत्रि, कौशिक तथा सुदर्शन जैसे सारे ऋषि वहाँ उपस्थित थे।
 
तात्पर्य
 पर्वत मुनि सबसे ज्येष्ठ मुनि माने जाते हैं। वे नारद मुनि के लगभग निरन्तर संगी होते हैं। वे अन्तरिक्ष यात्री भी हैं, जो किसी भौतिक यान की सहायता के बिना वायु में यात्रा करने में समर्थ हैं। पर्वत मुनि भी नारद के समान ही देवर्षि अर्थात् देवताओं में महान ऋषि हैं। वे महाराज परीक्षित के पुत्र महाराज जनमेजय के यज्ञ के समय नारद के साथ उपस्थित थे। इस यज्ञ में विश्व के सारे सर्पों का विनाश किया जाना था। पर्वत मुनि तथा नारद मुनि गंधर्व भी कहलाते हैं, क्योंकि वे भगवान् की महिमा का गायन करते हुए आकाश में विचरण कर सकते हैं। चूँकि वे आकाश में विचरण कर सकते हैं, अतएव उन्होंने वहीं से द्रौपदी का स्वयंवर (पति का चुनाव) देखा था। नारद मुनि की भाँति पर्वत मुनि भी स्वर्ग में राजा इन्द्र के दरबार में जाया करते थे। गंधर्व के रूप में वे कभी-कभी एक महत्त्वपूर्ण देवता कुबेर के राज-दरबार में जाते थे। एक बार नारद तथा पर्वत दोनों के ही सामने महाराज सृञ्जय की पुत्री के कारण समस्या आ खड़ी हुई। महाराज सृञ्जय को पर्वत मुनि के वरदान से पुत्र-लाभ हुआ।
नारद मुनि का पुराणों की कथाओं से अनिवार्य सम्बन्ध है। उनका वर्णन भागवतम् में हुआ है। अपने पूर्वजन्म में वे एक दासी के पुत्र थे, लेकिन शुद्ध भक्तों की संगति से उनमें भक्ति जगी और अगले जन्म में वे अद्वितीय सिद्ध पुरुष बने। महाभारत में उनके नाम का उल्लेख कई स्थानों पर हुआ है। वे प्रमुख देवर्षि हैं। वे ब्रह्माजी के पुत्र तथा शिष्य हैं और उन्हीं से ब्रह्मा के आगे की शिष्य-परम्परा चलती है। उन्होंने प्रह्लाद महाराज, ध्रुव महाराज तथा अनेक विख्यात भगवद्भक्तों को दीक्षित किया। यहाँ तक कि उन्होंने वैदिक ग्रंथों के प्रणेता व्यासदेव को भी दीक्षा दी।

व्यासदेव से ही मध्वाचार्य को दीक्षा मिली और इस प्रकार मध्व-सम्प्रदाय जिसमें गौड़ीय सम्प्रदाय भी सम्मिलित है, सारे ब्रह्माण्ड में फैल गया। श्री चैतन्य महाप्रभु का सम्बन्ध इसी मध्व सम्प्रदाय से था। अतएव ब्रह्माजी, नारद, व्यास से लेकर मध्व, चैतन्य तथा षड् गोस्वामी—ये सारे एक ही शिष्य-परम्परा से सम्बन्धित थे। नारद जी ने अनादि काल से अनेक राजाओं को दीक्षा दी। भागवत में हम उन्हें प्रह्लाद महाराज को माता के गर्भ में उपदेश देते पाते हैं। उन्होंने कृष्ण के पिता वसुदेव तथा महाराज युधिष्ठिर को भी उपदेश दिया था।

धौम्य—ये एक महान ऋषि थे, जिन्होंने उत्कोचक तीर्थ में कठिन तपस्या की और उन्हें पाण्डव राजाओं के राजपुरोहित के रूप में नियुक्त किया गया। उन्होंने पाण्डवों के अनेक संस्कारों में पुरोहिताई की और द्रौपदी की सगाई के समय उन्होंने हरेक पाण्डव का संस्कार कराया। वे पाण्डवों के वनवास के समय भी उपस्थित थे और जब भी उन्हें कोई कठिनाई होती, तो वे उन्हें परामर्श दिया करते थे। उन्होंने उपदेश दिया था कि किस प्रकार एक वर्ष तक अज्ञातवास किया जाय और पाण्डवों ने उनके उपदेश का कठोरता से पालन किया था। कुरुक्षेत्र-युद्ध के बाद जब सामूहिक अंतिम संस्कार सम्पन्न हुआ, तो भी उनका नाम आता है। महाभारत के अनुशासन पर्व (१२७.१५-१६) में उन्होंने महाराज युधिष्ठिर को अत्यन्त विस्तृत धार्मिक उपदेश दिया है। वास्तव में वे गृहस्थों के लिए उपयुक्त पुरोहित थे, क्योंकि वे पाण्डवों को धर्म के उचित पथ पर मार्गदर्शन कर सके। पुरोहित का कार्य गृहस्थ को आश्रम धर्म या किसी वर्णविशेष की वृत्ति के समुचित मार्ग पर क्रमश: अग्रसर कराना है। एक कुल-पुरोहित तथा आध्यात्मिक गुरु में कोई विशेष अन्तर नहीं होता। ऋषि, मुनि, सन्त तथा ब्राह्मण ऐसे ही कार्यों के लिये हुआ करते थे।

बादरायण (व्यासदेव)—वे कृष्ण, कृष्ण द्वैपायन, द्वैपायन, सत्यवती-सुत, पाराशर्य, पराशरात्मज, बादरायण, वेदव्यास आदि नामों से विख्यात हैं। वे महान सेनापति पितामह भीष्मदेव के पिता महाराज शन्तनु से, उनकी माता सत्यवती की सगाई होने के पूर्व ही, उनके गर्भ से महामुनि पराशर के पुत्र-रूप में उत्पन्न हुए थे। वे नारायण के शक्त्यावेश अवतार हैं और वे सारे विश्व में वैदिक ज्ञान का प्रसार करते हैं। इसलिये जब किसी वैदिक ग्रंथ का, विशेष रूप से पुराणों का पारायण करना होता है, तब व्यासदेव को नमस्कार किया जाता है। शुकदेव गोस्वामी इनके पुत्र थे और वेदों की विभिन्न शाखाओं के लिये नियुक्त वैशम्पायन जैसे ऋषि, उनके शिष्य थे। वे महाकाव्य महाभारत तथा परम दिव्य ग्रंथ भागवत के रचनाकार हैं। उन्होंने ब्रह्म-सूत्र—वेदान्त सूत्र या बादरायण-सूत्र—का संकलन किया था। अपनी कठिन तपस्या के कारण वे ऋषियों में सर्वाधिक सम्मानित रचनाकार हैं। उन्होंने कलियुग की जनता के कल्याणार्थ जब अपने महाकाव्य महाभारत को लिखाना चाहा, तब उन्हें ऐसे समर्थ लिपिक की आवश्यकता हुई, जो उनके श्रुत लेख को लिखता जाय। ब्रह्माजी के आदेश से श्रीगणेशजी ने यह कार्य इस शर्त पर स्वीकार कर लिया कि व्यासदेव एक क्षण भी रुकेंगे नहीं। इस प्रकार व्यास तथा गणेश के संयुक्त प्रयास से महाभारत संकलित हुआ।

अपनी माता सत्यवती के आदेश से, जो बाद में शन्तनु से ब्याही गईं, तथा महाराज शन्तनु की प्रथम पत्नी गंगा से उत्पन्न शन्तनु के सबसे बड़े पुत्र भीष्मदेव के अनुरोध से व्यासदेव ने तीन मेधावी पुत्र उत्पन्न किये, जिनके नाम थे धृतराष्ट्र, पाण्डु तथा विदुर। व्यासदेव ने कुरुक्षेत्र-युद्ध के बाद तथा महाभारत के सारे योद्धाओं की मृत्यु के बाद महाभारत का संकलन किया। सर्वप्रथम महाराज परीक्षित के पुत्र महाराज जनमेजय के राज-दरबार में इसे सुनाया गया।

बृहदश्व—ये एक प्राचीन मुनि थे, जो महाराज युधिष्ठिर से यदा-कदा मिला करते थे। सर्वप्रथम वे महाराज युधिष्ठिर से काम्यवन में मिले थे। इन्होंने ही महाराज नल की कथा सुनाई थी। एक अन्य बृहदश्व भी थे, जो इक्ष्वाकु-वंश में उत्पन्न हुए थे (महाभारत, वन-पर्व, २०९.४- ५)।

भरद्वाज—ये महान सप्तर्षियों में से एक थे और अर्जुन के जन्मोत्सव के समय उपस्थित थे। इस शक्तिशाली ऋषि ने कभी गंगा के तट पर कठिन तपस्या की थी और इनका आश्रम आज भी प्रयाग धाम में विख्यात है। ऐसा कहा जाता है कि जब ये ऋषि गंगा में स्नान कर रहे थे, तो स्वर्ग की एक सुन्दर अप्सरा घृतची से इनकी भेंट हुई। इस कारण से इनका वीर्य स्खलित हुआ, जिसे एक मिट्टी के बर्तन में सुरक्षित रख दिया गया, जिससे द्रोण उत्पन्न हुए। इस तरह द्रोणाचार्य भरद्वाज मुनि के पुत्र थे। कुछ लोग द्रोण के पिता भरद्वाज को इन महर्षि भरद्वाज से भिन्न मानते हैं। ये ब्रह्मा के महान भक्त थे। ये एक बार द्रोणाचार्य के पास भी गये और इन्होंने उनसे कुरुक्षेत्र-युद्ध बन्द करने का आग्रह किया।

परशुराम या रेणुकासुत—ये महर्षि जमदग्नि तथा श्रीमती रेणुका के पुत्र थे। इस तरह वे रेणुका-सुत भी कहलाते हैं। वे ईश्वर के शक्तिशाली अवतारों में से एक थे और उन्होंने क्षत्रिय वंश का इक्कीस बार संहार किया था। उन्होंने क्षत्रियों के रक्त से अपने पूर्वजों की आत्माओं को प्रसन्न किया। बाद में उन्होंने महेन्द्र पर्वत पर घोर तपस्या की। उन्होंने सम्पूर्ण पृथ्वी को क्षत्रियों से छीन कर, उसे कश्यप मुनि को दान में दे दिया। परशुराम ने द्रोणाचार्य को धनुर्वेद की शिक्षा प्रदान की, क्योंकि वे ब्राह्मण थे। वे महाराज युधिष्ठिर के राजतिलक के समय उपस्थित थे और अन्य महान ऋषियों के साथ इस उत्सव में सम्मिलित हुए थे।

परशुराम की आयु इतनी अधिक थी कि वे विभिन्न युगों में राम तथा कृष्ण दोनों से मिले थे। उन्होंने राम से युद्ध किया था, लेकिन कृष्ण को उन्होंने भगवान् के रूप में स्वीकार किया था। उन्होंने जब अर्जुन को कृष्ण के साथ देखा, तो उसकी प्रशंसा भी की थी। जब भीष्म ने विवाह की इच्छुक अम्बा से विवाह करने से इनकार कर दिया था, तो अम्बा परशुराम से मिली थी और उसकी प्रार्थना पर उन्होंने भीष्मदेव से उसे पत्नी-रूप स्वीकार करने के लिये कहा था। अपने गुरु होते हुए भी भीष्मदेव ने उनकी बात नहीं मानी थी। अत: परशुराम ने उनसे युद्ध किया था। दोनों में घमासान युद्ध हुआ और अन्त में परशुराम भीष्म से प्रसन्न हुए और उन्होंने उनको विश्व का सबसे बड़ा योद्धा होने का वरदान दिया था।

वसिष्ठ—ये ब्राह्मणों में सबसे विख्यात ऋषि थे और ब्रह्मर्षि वसिष्ठदेव कहलाते थे। वे रामायण तथा महाभारत दोनों ही कालों के विख्यात व्यक्तित्व थे। उन्होंने भगवान् श्रीराम का राजतिलक सम्पन्न कराया था और वे कुरुक्षेत्र के युद्ध में भी उपस्थित थे। वे समस्त उच्च लोकों तथा अधोलोकों में जा सकते थे और उनका नाम हिरण्यकशिपु के इतिहास के साथ भी जुड़ा हुआ है। विश्वामित्र तथा उनके बीच बहुत तनाव उत्पन्न हुआ था, क्योंकि विश्वामित्र उनकी कामधेनु गाय लेना चाहते थे। जब वसिष्ठ मुनि ने अपनी कामधेनु देने से इनकार कर दिया, तो विश्वामित्र ने इनके सौ पुत्रों को मार डाला। एक पूर्ण ब्राह्मण होने के नाते वे विश्वामित्र के सारे व्यंग्य सहते रहे। एक बार तो विश्वामित्र के प्रताडऩों से ऊबकर उन्होंने आत्महत्या भी करनी चाही, किन्तु उनकेवे ऐसा कर नहीं पाये। वे पर्वत से कूदे, किन्तु वे जिन पत्थरों पर गिरे, वे रुई के ढेर बन गये और वे बच गये। वे समुद्र में भी कूदे, किन्तु लहरों ने उन्हें पुन: किनारे पर ला दिया। वे नदी में भी कुदे, लेकिन नदी ने उन्हें पुन: किनारे पर ला दिया। इस प्रकार उनके आत्महत्या के सारे प्रयास विफल रहे। वे सप्तर्षियों में से एक हैं और ये सुप्रसिद्ध नक्षत्र अरुन्धती के पति हैं।

इन्द्रप्रमद—ये एक अन्य विख्यात ऋषि हैं।

त्रित—वे प्रजापति गौतम के तीन पुत्रों में से एक थे। पुत्रों में वे तीसरे थे और उनके अन्य भाइयों के नाम एकत और द्वित थे। ये सभी भाई महान ऋषि थे और धर्म के चुस्त पालक थे। कठोर तपस्या के बल पर वे ब्रह्मलोक को प्राप्त हुए थे। एक बार त्रित मुनि कुएँ में भी गिर गये। वे अनेक यज्ञों के व्यवस्थापक थे और महर्षि के रूप में मृत्यु-शय्या पर पड़े भीष्मदेव को अपना सम्मान प्रदर्शित करने वे भी आये थे। वे वरुणलोक के सप्तर्षियों में से एक थे। वे विश्व के पाश्चात्य देशों के रहनेवाले थे। अत:, सम्भवत: वे यूरोपीय देशों के निवासी थे। उस समय सारा जगत एक ही वैदिक संस्कृति के अधीन था।

गृत्समद—स्वर्ग के एक ऋषि। वे स्वर्ग के राजा इन्द्र के घनिष्ठ मित्र थे और वृहस्पति के समान ही महान् थे। महाराज युधिष्ठिर के दरबार में उनका आना जाना रहता था और उस स्थान पर भी वे गये, जहाँ भीष्मदेव ने अपनी अंतिम श्वास ली। कभी-कभी वे महाराज युधिष्ठिर के समक्ष शिवजी का गुणानुवाद किया करते थे। वे वीतहव्य के पुत्र थे और देखने में इन्द्र की आकृति से मिलते-जुलते थे। कुछ बार इन्द्र के शत्रुओं ने उन्हें इन्द्र समझ कर बन्दी बना लिया था। वे ऋग्वेद के विद्वान थे और ब्राह्मणों द्वारा उन्हें अत्यधिक सम्मान दिया जाता था। उन्होंने ब्रह्मचर्य-जीवन बिताया और वे सभी प्रकार से शक्तिसम्पन्न थे।

असित—इसी नाम का एक राजा भी हुआ है, लेकिन यहाँ पर असित का नाम असित देवल ऋषि के लिए प्रयुक्त है, जो अपने समय के शक्तिसम्पन्न ऋषि थे। उन्होंने महाभारत के पन्द्रह लाख श्लोकों की व्याख्या अपने पिता को सुनाई। वे जनमेजय के नाग-यज्ञ में सम्मिलित हुए थे। वे अन्य महर्षियों के साथ महाराज युधिष्ठिर के राज्याभिषेक में भी उपस्थित थे। जब महाराज युधिष्ठिर अञ्जन पर्वत पर थे, तो इन्होंने उन्हें उपदेश भी दिया था। वे शिवजी के भी भक्त थे।

कक्षीवान्—गौतम मुनि के पुत्रों में से एक तथा महर्षि चन्दकौशिक के पिता थे। वे महाराज युधिष्ठिर की संसद के सदस्य थे।

अत्रि—अत्रि मुनि महान ब्राह्मण ऋषि थे और ब्रह्माजी के मानसपुत्र थे। ब्रह्माजी इतने शक्तिमान हैं कि चिन्तन मात्र से पुत्र उत्पन्न कर सकते हैं। ये पुत्र मानसपुत्र कहलाते हैं। अत्रि, ब्रह्माजी के सप्त मानसपुत्रों तथा सप्त ब्रह्मर्षियों में से एक थे। उन्हीं के परिवार में महान् प्रचेतागण भी उत्पन्न हुए थे। अत्रि मुनि के दो क्षत्रिय पुत्र थे और दोनों ही राजा बने, जिनमें से एक का नाम राजा अर्थम था। इक्कीस प्रजापतियों में इनकी भी गणना की जाती है। इनकी पत्नी का नाम अनसूया था। इन्होंने महाराज परीक्षित के महान् यज्ञों में उनकी सहायता की थी।

कौशिक—महाराज युधिष्ठिर के राज-दरबार के स्थायी ऋषि सदस्य थे। ये कभी-कभी भगवान् कृष्ण से भी मिलते रहते थे। इसी नाम के अनेक अन्य ऋषि हुए हैं। सुदर्शन—यह सर्वाधिक शक्तिशाली अस्त्र है, यहाँ तक कि ब्रह्मास्त्र या अन्य विध्वंसक अस्त्रों से भी यह श्रेष्ठ है और इस चक्र को भगवान् ने (विष्णु या कृष्ण ने) अपने अस्त्र के रूप में स्वीकार किया था। किन्हीं-किन्हीं वैदिक ग्रंथों में कहा गया है कि अग्निदेव ने यह अस्त्र श्रीकृष्ण को प्रदान किया था, लेकिन सच्चाई तो यह है कि भगवान् इस अस्त्र को निरन्तर धारण किये रहते हैं। अग्निदेव ने यह अस्त्र श्रीकृष्ण को उसी प्रकार अर्पित किया, जिस प्रकार महाराज रुक्म ने उन्हें अपनी पुत्री रुक्मिणी प्रदान की थी। भगवान् अपने भक्तों की ऐसी भेंटें स्वीकार करते रहते हैं, यद्यपि ये उन्हीं की नित्य सम्पत्ति हैं। महाभारत के आदिपर्व में इस सुदर्शन अस्त्र का विस्तृत वर्णन मिलता है। भगवान् कृष्ण ने इसका उपयोग अपने प्रतिद्वंद्वी शिशुपाल के वध के लिये किया। उन्होंने इसी के द्वारा शाल्व का भी वध किया और कभी कभी उन्होंने चाहा था कि अर्जुन अपने शत्रुओं का संहार करने के लिये इस चक्र का प्रयोग करे (महाभारत, विराट पर्व ५६.३)।

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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥