श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 1: भगवान् श्रीकृष्ण का अवतार: परिचय  » 
 
 
 
 
संक्षेप विवरण:  प्रथम अध्याय का सारांश इस प्रकार है। इस अध्याय में बताया गया है कि देवकी के आठवें पुत्र द्वारा मारे जाने के अपशकुन को सुनकर डरे हुए कंस ने किस तरह देवकी के पुत्रों...
 
श्लोक 1:  राजा परीक्षित ने कहा : हे प्रभु, आपने चन्द्रदेव तथा सूर्यदेव दोनों के वंशों का, उनके राजाओं के महान् तथा अद्भुत चरित्रों सहित विशद वर्णन किया है।
 
श्लोक 2:  हे मुनिश्रेष्ठ, आप परम पवित्र तथा धर्मशील यदुवंशियों का भी वर्णन कर चुके हैं। अब हो सके तो कृपा करके उन भगवान् विष्णु या कृष्ण के अद्भुत महिमामय कार्यकलापों का वर्णन करें जो यदुवंश में अपने अंश बलदेव के साथ प्रकट हुए हैं।
 
श्लोक 3:  परमात्मा अर्थात् पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् कृष्ण, जो विराट जगत के कारण हैं, यदुवंश में प्रकट हुए। आप कृपा करके मुझे उनके यशस्वी कार्यकलापों तथा उनके चरित्र का आदि से लेकर अन्त तक वर्णन करें।
 
श्लोक 4:  भगवान् की महिमा का वर्णन परम्परा-पद्धति से किया जाता है अर्थात् यह अध्यात्मिक गुरु से शिष्य तक पहुँचाया जाता है। ऐसे वर्णन का आनन्द उन लोगों को मिलता है, जो इस जगत के मिथ्या, क्षणिक वर्णन में रुचि नहीं रखते। भगवान् का गुणगान जन्म-मृत्यु के चक्कर में फँसे बद्धजीवों के लिए उपयुक्त औषधि है। अतएव कसाई (पशुघाती) या अपने को ही मारने वाले (आत्मघाती) के अतिरिक्त भगवान् की महिमा को सुनना कौन नहीं चाहेगा?
 
श्लोक 5-7:  कृष्ण के चरणकमल रूपी नाव को लेकर मेरे बाबा अर्जुन तथा अन्यों ने उस कुरुक्षेत्र युद्धस्थल रूपी सागर को पार कर लिया जिसमें भीष्मदेव जैसे सेनापति उन बड़ी-बड़ी मछलियों के तुल्य थे, जो उन्हें आसानी से निगल गई होतीं। मेरे पितामहों ने भगवान् श्रीकृष्ण की कृपा से इस दुर्लंघ्य सागर को इतनी सरलता से पार कर लिया मानो कोई गोखुर का चिन्ह हो। चूँकि मेरी माता ने सुदर्शन चक्रधारी भगवान् श्रीकृष्ण के चरणकमलों की शरण ग्रहण की थी अत: उन्होंने उनके गर्भ में प्रवेश करके मुझे बचा लिया जो कौरवों तथा पाण्डवों का अन्तिम बचा हुआ उत्तराधिकारी था और जिसे अश्वत्थामा ने अपने ब्रह्मास्त्र से नष्टप्राय कर दिया था। भगवान् कृष्ण ने समस्त देहधारी जीवों के भीतर तथा बाहर शाश्वत काल के रूपों में—यथा परमात्मा तथा विराट रूपों में—अपनी शक्ति से प्रकट होकर हर एक को क्रूर मृत्यु के रूप में या जीवन के रूप में मोक्ष प्रदान किया। कृपया उनके दिव्य गुणों का वर्णन करके मुझे प्रबुद्ध कीजिए।
 
श्लोक 8:  हे शुकदेव गोस्वामी, आप पहले ही बता चुके हैं कि द्वितीय चतुर्व्यूह से सम्बन्धित संकर्षण रोहिणी के पुत्र बलराम के रूप में प्रकट हुए। यदि बलराम को एक शरीर से दूसरे शरीर में स्थानान्तरित न किया गया होता तो यह कैसे सम्भव हो पाता कि वे पहले देवकी के गर्भ में रहते और बाद में रोहिणी के गर्भ में? कृपया मुझसे इसकी व्याख्या कीजिए।
 
श्लोक 9:  भगवान् कृष्ण ने अपने पिता वसुदेव का घर क्यों छोड़ा और अपने को वृन्दावन में नन्द के घर क्यों स्थानान्तरित किया? यदुवंश के स्वामी अपने सम्बन्धियों के साथ वृन्दावन में कहाँ रहे?
 
श्लोक 10:  भगवान् कृष्ण वृन्दावन तथा मथुरा दोनों जगह रहे तो वहाँ उन्होंने क्या किया? उन्होंने अपनी माता के भाई (मामा) कंस को क्यों मारा जबकि शास्त्र ऐसे वध की रंचमात्र भी अनुमति नहीं देते?
 
श्लोक 11:  भगवान् कृष्ण का शरीर भौतिक नहीं है, फिर भी वे मानव के रूप में प्रकट होते हैं। वे वृष्णि के वंशजों के साथ कितने वर्षों तक रहे? उनके कितनी पत्नियाँ थीं? वे द्वारका में कितने वर्षों तक रहे?
 
श्लोक 12:  हे महामुनि, आप कृष्ण के विषय में सब कुछ जानते हैं अतएव उन सारे कार्यकलापों का वर्णन विस्तार से करें जिनके बारे में मैंने पूछा है तथा उनके बारे में भी जिनके विषय में मैंने नहीं पूछा क्योंकि उन पर मेरा पूर्ण विश्वास है और मैं उन सबको सुनने के लिए अत्यन्त उत्सुक हूँ।
 
श्लोक 13:  मृत्यु द्वार पर होते हुए अपने व्रत के कारण मैंने जल ग्रहण करना भी छोड़ दिया है फिर भी आपके कमलमुख से निकले कृष्ण-कथा रूपी अमृत का पान करने से मेरी असह्य भूख तथा प्यास मुझे किसी तरह भी बाधा नहीं पहुँचा रही।
 
श्लोक 14:  सूत गोस्वामी ने कहा : हे भृगुपुत्र (शौनक ऋषि), परम आदरणीय व्यासपुत्र भक्त शुकदेव गोस्वामी ने महाराज परीक्षित के शुभ प्रश्नों को सुनकर राजा को सादर धन्यवाद दिया। फिर उन्होंने कृष्णकथा के विषय में वार्ता प्रारम्भ की जो इस कलियुग के समस्त कष्टों के लिए औषधि है।
 
श्लोक 15:  श्रील शुकदेव गोस्वामी के कहा : हे राजर्षियों में श्रेष्ठ, चूँकि आप वासुदेव की कथाओं के प्रति अत्यधिक आकृष्ट हैं अत: निश्चित रूप से आपकी बुद्धि आध्यात्मिक ज्ञान में स्थिर है, जो मानवता का एकमात्र असली लक्ष्य है। चूँकि यह आकर्षण अनवरत रहता है अतएव निश्चितरूप से उत्कृष्ट है।
 
श्लोक 16:  भगवान् विष्णु के चरणों के अँगूठे से निकलने वाली गंगा तीनों लोकों—ऊपरी, मध्य तथा अध: लोकों—को पवित्र बनाने वाली है। इसी तरह जब कोई व्यक्ति भगवान् वासुदेव कृष्ण की लीलाओं तथा गुणों के विषय में प्रश्न करता है, तो तीन प्रकार के व्यक्ति—वक्ता या उपदेशक, प्रश्नकर्ता तथा सुनने वाले मनुष्य—शुद्ध हो जाते हैं।
 
श्लोक 17:  एक बार माता पृथ्वी राजाओं के वेश में गर्वित लाखों असुरों की सेना से बोझिल हो उठी तो वह इससे छुटकारा पाने के लिए ब्रह्मा के पास पहुँची।
 
श्लोक 18:  माता पृथ्वी ने गाय का रूप धारण किया। वह अत्यन्त दुखियारी, अपनी आँखों में आँसू भर कर भगवान् ब्रह्मा के समक्ष प्रकट हुई और उसने उनसे अपनी विपदा कह सुनायी।
 
श्लोक 19:  माता पृथ्वी की विपदा सुनकर ब्रह्माजी, माता पृथ्वी तथा शिवजी एवं अन्य समस्त देवताओं के साथ क्षीरसागर के तट पर जा पहुँचे।
 
श्लोक 20:  क्षीर सागर के तट पर पहुँच कर सारे देवताओं ने समस्त ब्रह्माण्ड के स्वामी, समस्त देवताओं के परम ईश तथा हर एक का पालन करने वाले और उनके दुखों को दूर करने वाले भगवान् विष्णु की पूजा की। उन्होंने बड़े ही मनोयोग से पुरुषसूक्त नामक वैदिक मंत्रों के पाठ द्वारा क्षीर सागर में शयन करने वाले भगवान् विष्णु की पूजा की।
 
श्लोक 21:  ब्रह्माजी जब समाधि में थे, भगवान् विष्णु के शब्दों को आकाश में ध्वनित होते सुना। तब उन्होंने देवताओं से कहा, “अरे देवताओ! मुझसे परम पुरुष क्षीरोदकशायी विष्णु का आदेश सुनो और बिना देर लगाए उसे ध्यानपूर्वक पूरा करो।”
 
श्लोक 22:  भगवान् ब्रह्माजी ने देवताओं को बतलाया: हमारे द्वारा याचना करने के पूर्व ही भगवान् पृथ्वी के संकट से अवगत हो चुके थे। फलत: जब तक भगवान् अपनी काल शक्ति के द्वारा पृथ्वी का भार कम करने के लिए पृथ्वी पर गतिशील रहें तब तक तुम सभी देवताओं को यदुओं के परिवार में उनके पुत्रों तथा पौत्रों के अंश के रूप में अवतीर्ण होना होगा।
 
श्लोक 23:  सर्वशक्तिमान भगवान् कृष्ण वसुदेव के पुत्र रूप में स्वयं प्रकट होंगे। अत: देवताओं की सारी स्त्रियों को भी उन्हें प्रसन्न करने के लिए प्रकट होना चाहिए।
 
श्लोक 24:  कृष्ण का सबसे अग्रणी स्वरूप संकर्षण है, जो अनन्त कहलाता है। वह इस भौतिक जगत में सारे अवतारों का उद्गम है। भगवान् कृष्ण के प्राकटय के पूर्व यह आदि संकर्षण कृष्ण को उनकी दिव्य लीलाओं में प्रसन्न करने के लिए बलदेव के रूप में प्रकट होगा।
 
श्लोक 25:  विष्णु माया कहलाने वाली भगवान् की शक्ति जो भगवान् के ही समान है, भगवान् कृष्ण के साथ-साथ ही प्रकट होगी। यह शक्ति विभिन्न पदों पर कार्य करती हुई भौतिक तथा आध्यात्मिक सभी जगतों को मोहने वाली है। वह अपने स्वामी के आग्रह पर भगवान् का कार्य सम्पन्न करने के लिए अपनी विविध शक्तियों सहित प्रकट होगी।
 
श्लोक 26:  शुकदेव गोस्वामी ने आगे कहा : इस तरह देवताओं को सलाह देकर तथा माता पृथ्वी को आश्वस्त करते हुए अत्यन्त शक्तिशाली ब्रह्माजी, जो समस्त प्रजापतियों के स्वामी होने से प्रजापति-पति कहलाते हैं, अपने धाम ब्रह्मलोक लौट गये।
 
श्लोक 27:  प्राचीन काल में यदुवंश का मुखिया शूरसेन मथुरा नामक नगरी में रहने के लिए गया। वहाँ उसने माथुर तथा शूरसेन नामक स्थानों का भोग किया।
 
श्लोक 28:  उस समय से मथुरा नगरी सारे यदुवंशी राजाओं की राजधानी बनी रही। मथुरा नगरी तथा मथुरा जनपद कृष्ण से घनिष्टतापूर्वक जुड़े हैं क्योंकि वहाँ कृष्ण का नित्य वास है।
 
श्लोक 29:  कुछ समय पूर्व देववंश (या शूरवंश) के वसुदेव ने देवकी से विवाह किया। विवाह के बाद वह अपनी नवविवाहिता पत्नी के साथ घर लौटने के लिए अपने रथ पर आरूढ़ हुआ।
 
श्लोक 30:  राजा उग्रसेन के पुत्र कंस ने अपनी बहन देवकी को उसके विवाह के अवसर पर प्रसन्न करने की दृष्टि से घोड़ों की लगामें अपने हाथ में थाम लीं और स्वयं रथचालक (सारथी) बन गया। वह सैकड़ों सुनहरे रथों से घिरा था।
 
श्लोक 31-32:  देवकी का पिता राजा देवक अपनी पुत्री को अत्यधिक स्नेह था। अतएव जब देवकी तथा उसका पति घर से विदा होने लगे तो उसने दहेज में सोने के हारों से सुसज्जित चार सौ हाथी दिए। साथ ही दस हजार घोड़े, अठारह हजार रथ तथा दो सौ अत्यन्त सुन्दर तथा गहनों से अच्छी तरह अलंकृत युवा दासियाँ दीं।
 
श्लोक 33:  हे प्रिय पुत्र महाराज परीक्षित, जब दूल्हा तथा दुल्हन विदा होने लगे तो उनकी शुभ विदाई पर शंख, तुरही, मृदंग तथा नगाड़े एकसाथ बजने लगे।
 
श्लोक 34:  जब कंस घोड़ों की लगाम थामे मार्ग पर रथ हाँक रहा था, तो किसी अशरीरी आवाज ने उसको सम्बोधित किया, “अरे मूर्ख दुष्ट! तुम जिस स्त्री को लिए जा रहे हो उसकी आठवीं सन्तान तुम्हारा वध करेगी।”
 
श्लोक 35:  कंस भोजवंश का अधम व्यक्ति था क्योंकि वह ईर्ष्यालु तथा पापी था। इसलिए उसने जब यह आकाशवाणी सुनी तो उसने बाएँ हाथ से अपनी बहन के बाल पकड़ लिए और उसके सिर को धड़ से अलग करने के लिए दाहिने हाथ से अपनी तलवार निकाली।
 
श्लोक 36:  कंस इतना क्रूर तथा ईर्ष्यालु था कि वह निर्लज्जतापूर्वक अपनी बहन को मारने के लिए तैयार था अत: उसे शान्त करने के लिए कृष्ण के होने वाले पिता महात्मा वसुदेव ने उससे निम्नलिखित शब्द कहे।
 
श्लोक 37:  वसुदेव ने कहा : हे साले महाशय, तुम्हारे भोज परिवार को तुम पर गर्व है और बड़े-बड़े शूरवीर तुम्हारे गुणों की प्रशंसा करते हैं। भला तुम्हारे जैसा योग्य व्यक्ति एक स्त्री को, जो उसी की बहन है, विशेष रूप से उसके विवाह के अवसर पर, मार कैसे सकता है?
 
श्लोक 38:  हे शूरवीर, जिसने जन्म लिया है उसकी मृत्यु निश्चित है, क्योंकि शरीर के ही साथ मृत्यु का उद्भव होता है। कोई चाहे आज मरे या सौ वर्षों बाद, किन्तु प्रत्येक जीव की मृत्यु निश्चित है।
 
श्लोक 39:  जब यह शरीर मिट्टी बन जाता है और फिर से पाँच तत्त्वों में—पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु तथा आकाश—परिणत हो जाता है, तो शरीर का स्वामी जीव स्वत: अपने सकाम कर्मों के अनुसार भौतिक तत्त्वों से बना दूसरा शरीर प्राप्त करता है। अगला शरीर प्राप्त होने पर वह वर्तमान शरीर को त्याग देता है।
 
श्लोक 40:  जिस तरह रास्ते पर चलते हुए मनुष्य अपना एक पाँव जमीन पर टेकता है और फिर दूसरे पाँव को उठाता है या जिस तरह वनस्पति का एक कीड़ा पहले एक पत्ती पर बैठता है और फिर इसे छोड़ कर दूसरी पत्ती पर जाता है उसी तरह जब बद्धजीव दूसरे शरीर का आश्रय ग्रहण करता है तब पिछले शरीर को त्याग देता है।
 
श्लोक 41:  किसी परिस्थिति को देखकर या सुनकर ही मनुष्य उसके बारे में चिन्तन-मनन करता है और अपने इस शरीर का विचार न करते हुए उसके वशीभूत हो जाता है। इसी तरह मानसिक संतुलन द्वारा वह रात में भिन्न शरीरों तथा भिन्न परिस्थितियों में रहकर सपना देखता है और अपनी वास्तविक स्थिति को भूल जाता है। उसी प्रक्रिया के अन्तर्गत वह अपना वर्तमान शरीर त्यागकर दूसरा शरीर ग्रहण करता है (तथा देहान्तरप्राप्ति:)।
 
श्लोक 42:  मृत्यु के समय मनुष्य सकाम कर्मों में निहित मन के सोचने, अनुभव करने और चाहने के अनुसार ही शरीर-विशेष प्राप्त करता है। दूसरे शब्दों में, मन के कार्यकलापों के अनुसार ही शरीर विकास करता है। शरीर के परिवर्तन मन की चंचलता के कारण हैं अन्यथा आत्मा तो मूल आध्यात्मिक शरीर में रह सकता है।
 
श्लोक 43:  जब आकाश में स्थित नक्षत्र जैसे सूर्य, चन्द्रमा तथा तारे तेल या जल जैसे तरल पदार्थों में प्रतिबिम्बित होते हैं, तो वायु के वेग के कारण वे विभिन्न आकारों के लगते हैं कभी गोल, कभी लम्बे तो कभी और कुछ। इसी तरह जब जीवात्मा भौतिकतावादी विचारों में मग्न रहता है, तो वह अज्ञान के कारण विविध रूपों को अपनी पहचान के रूप में ग्रहण करता है। दूसरे शब्दों में, प्रकृति के भौतिक गुणों से विचलित होने के कारण वह मनोरथों के द्वारा मोहग्रस्त हो जाता है।
 
श्लोक 44:  चूँकि ईष्यालु एवं अपवित्र कार्य ऐसे शरीर का कारण बनते हैं जिससे अगले जीवन में कष्ट भोगना पड़ता है इसलिए मनुष्य अपवित्र कार्य करे ही क्यों? अपने कल्याण को ध्यान में रखते हुए मनुष्य को चाहिए कि वह किसी से ईर्ष्या न करे क्योंकि ईर्ष्यालु व्यक्ति को इस जीवन में या अगले जीवन में अपने शत्रुओं से सदा हानि का भय बना रहता है।
 
श्लोक 45:  तुम्हारी छोटी बहन बेचारी देवकी तुम्हारी पुत्री के समान है और वह लाड़-प्यार से पाले जाने योग्य है। तुम दयालु हो, अत: तुम्हें इसका वध नहीं करना चाहिए। निस्संदेह यह तुम्हारे स्नेह की पात्र है।
 
श्लोक 46:  शुकदेव गोस्वामी ने कहा : हे कुरुवंश में श्रेष्ठ, कंस अत्यंत क्रूर था और वास्तव में राक्षसों का अनुयायी था। अतएव वसुदेव के सदुपदेशों से उसे न तो समझाया-बुझाया जा सकता था, न ही भयभीत किया जा सकता था। उसे इस जीवन में या अगले जीवन में पापकर्मों के फलों की कोई चिन्ता नहीं थी।
 
श्लोक 47:  जब वसुदेव ने देखा कि कंस अपनी बहन देवकी को मार डालने पर तुला हुआ है, तो उसने अपने मन में गम्भीरतापूर्वक सोचा। मृत्यु को आया हुआ देखकर उसने कंस को रोकने का दूसरा उपाय सोचा।
 
श्लोक 48:  बुद्धिमान मनुष्य को चाहिए कि जब तक बुद्धि तथा शारीरिक पराक्रम रहे, तब तक मृत्यु से बचने का प्रयास करता रहे। हर देहधारी का यही कर्तव्य है। यदि उद्यम करने पर भी मृत्यु को टाला नहीं जा सके, तो मृत्यु को वरण करने वाला मनुष्य अपराधी नहीं है।
 
श्लोक 49-50:  वसुदेव ने विचार किया: मैं मृत्यु रूपी कंस को अपने सारे पुत्र देकर देवकी के प्राण बचा सकता हूँ। हो सकता है कि कंस मेरे पुत्रों के जन्म के पूर्व ही मर जाए, या फिर जब उसे मेरे पुत्र के हाथों से मरना लिखा है, तो मेरा कोई पुत्र उसे मारे ही। इस समय मुझे चाहिए कि मैं कंस को अपने सारे पुत्रों को सौंपने की प्रतिज्ञा कर लूँ जिससे कंस अपनी यह धमकी त्याग दे और यदि आगे चलकर कंस मर जाता है, तो फिर मुझे डरने की कोई बात नहीं रह जाती।
 
श्लोक 51:  जब किसी अदृश्य कारण से आग लकड़ी के एक टुकड़े से लपक कर दूसरे खंड को जला देती है, तो इसका कारण प्रारब्ध है। इसी तरह जब जीव एक प्रकार का शरीर स्वीकार करके दूसरे का परित्याग करता है, तो इसमें अदृश्य प्रारब्ध के अतिरिक्त कोई अन्य कारण नहीं होता।
 
श्लोक 52:  इस तरह इस विषय पर अपनी बुद्धिसे भरपूर विचार करने के बाद वसुदेव ने पापी कंस के समक्ष बड़े ही आदरपूर्वक अपना प्रस्ताव रखा।
 
श्लोक 53:  वसुदेव का मन चिन्ता से पूर्ण था क्योंकि उनकी पत्नी संकट में थीं, किन्तु क्रूर, निर्लज्ज तथा पापी कंस को प्रसन्न करने के उद्देश्य से बनावटी हँसी लाते हुए वे इस प्रकार बोले।
 
श्लोक 54:  वसुदेव ने कहा : हे भद्र-श्रेष्ठ, तुमने अदृश्यवाणी से जो भी सुना है उसके लिए तुम्हें अपनी बहन देवकी से तनिक भी डरने की कोई बात नहीं है। तुम्हारी मृत्यु का कारण उसके पुत्र होंगे अत: मैं तुम्हें वचन देता हूँ कि जब उसके पुत्र उत्पन्न होंगे, जिनसे तुम्हें डर है, तो उन सबको लाकर मैं तुम्हें सौंप दिया करूँगा।
 
श्लोक 55:  श्री शुकदेव गोस्वामी ने आगे कहा : कंस वसुदेव के तर्कों से सहमत हो गया और वसुदेव के वचनों पर पूरा भरोसा करके उसने अपनी बहन को मारने का विचार छोड़ दिया। वसुदेव ने कंस से प्रसन्न होकर उसे और भी सान्त्वना दी और अपने घर में प्रवेश किया।
 
श्लोक 56:  तत्पश्चात् प्रति-वर्ष समय आने पर ईश्वर तथा अन्य देवताओं की माता देवकी ने एक शिशु को जन्म दिया। इस तरह एक के बाद एक उनके आठ पुत्र तथा सुभद्रा नामक एक कन्या उत्पन्न हुई।
 
श्लोक 57:  वसुदेव अत्यधिक विह्वल थे कि कहीं उनका वचन भंग हुआ तो वे झूठे साबित होंगे। इस तरह उन्होंने बड़ी ही वेदना के साथ अपने प्रथम पुत्र कीर्तिमान को कंस के हाथों में सौंप दिया।
 
श्लोक 58:  वे साधु पुरुष जो सत्य पर अटल रहते हैं, उनके लिए क्या पीड़ादायक है? उन शुद्ध भक्तों के लिए जो भगवान् को तत्त्व के रूप में जानते हैं, भला स्वतंत्रता क्यों नहीं होती? निम्नचरित्र वाले पुरुषों के लिए कौन से कार्य वर्जित हैं? जिन्होंने भगवान् कृष्ण के चरणकमलों पर अपने को पूरी तरह समर्पित कर दिया है वे कृष्ण के लिए भला कौन सी वस्तु नहीं त्याग सकते?
 
श्लोक 59:  हे राजा परीक्षित, जब कंस ने देखा कि वसुदेव सत्य में स्थिर रहते हुए अपनी सन्तान उसे सौंपने में समभाव बने रहे, तो वह अत्यधिक प्रसन्न हुआ और उसने हँसते हुए यह कहा।
 
श्लोक 60:  हे वसुदेव, तुम अपने बच्चे को वापस ले सकते हो और घर जा सकते हो। मुझे तो तुम्हारी और देवकी की आठवीं सन्तान से चिन्तित हूँ, जिसके हाथों मेरी मृत्यु लिखी है।
 
श्लोक 61:  वसुदेव मान गये और वे अपना पुत्र घर वापस ले आए, किन्तु कंस चरित्रहीन तथा आत्मसंयमविहीन व्यक्ति था अतएव वसुदेव जानते थे कि कंस के शब्दों का कोई भरोसा नहीं।
 
श्लोक 62-63:  हे भरतवंशियों में श्रेष्ठ, महाराज परीक्षित, नन्द महाराज तथा उनके संगी ग्वाले तथा उनकी स्त्रियाँ स्वर्गलोक की ही वासी थीं। इसी तरह वसुदेव आदि वृष्णिवंशी तथा देवकी एवं यदुवंश की अन्य स्त्रियाँ भी स्वर्गलोक की वासी थीं। नन्द महाराज तथा वसुदेव के मित्र, सम्बन्धी, शुभचिन्तक तथा ऊपर से कंस के अनुयायी लगने वाले व्यक्ति सभी देवता ही थे।
 
श्लोक 64:  एक बार नारद मुनि कंस के पास गए और उसे यह बतलाया कि पृथ्वी के अत्यंत भारस्वरूप असुर व्यक्तियों का किस प्रकार वध किया जाने वाला है। इस तरह कंस अत्यधिक भय तथा संशय में पड़ गया।
 
श्लोक 65-66:  नारद ऋषि के चले जाने पर कंस ने सोचा कि यदुवंश के सारे लोग देवता हैं और देवकी के गर्भ से जन्म लेने वाली कोई भी सन्तान विष्णु हो सकती है। अत: अपनी मृत्यु के भय से कंस ने वसुदेव तथा देवकी को बन्दी बना लिया और उनके लोहे की जंजीरें डाल दीं। कंस ने इस भविष्यवाणी से सशंकित होकर कि विष्णु उसका वध करेंगे, हर सन्तान को इस आशंका से कि वह कहीं विष्णु न हो, एक एक करके मार डाला।
 
श्लोक 67:  इस पृथ्वी पर इन्द्रियतृप्ति के लालची राजा प्राय: सदा अपने शत्रुओं का अंधाधुंध वध करते हैं। वे अपनी सनक की पूर्ति के लिए किसी का भी, यहाँ तक कि अपनी माता, पिता, भाइयों या मित्रों का भी वध कर सकते हैं।
 
श्लोक 68:  पूर्व जन्म में कंस कालनेमि नाम का महान् असुर था और विष्णु द्वारा मारा गया था। नारद से यह जानकर कंस यदुवंश से सम्बन्धित हर किसी से द्वेष करने लगा।
 
श्लोक 69:  उग्रसेन के अत्यन्त बलशाली पुत्र कंस ने अपने पिता तक को, जो यदु, भोज तथा अंधक वंशों का राजा था, बन्दी बना लिया और शूरसेन नामक राज्यों का शासन स्वयं चलाने लगा।
 
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