श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 1: भगवान् श्रीकृष्ण का अवतार: परिचय  »  श्लोक 20

 
श्लोक
तत्र गत्वा जगन्नाथं देवदेवं वृषाकपिम् ।
पुरुषं पुरुषसूक्तेन उपतस्थे समाहित: ॥ २० ॥
 
शब्दार्थ
तत्र—वहाँ (क्षीरसागर के तट पर); गत्वा—जाकर; जगन्नाथम्—समग्र ब्रह्माण्ड के स्वामी को; देव-देवम्—सारे देवताओं के भी परम ईश्वर को; वृषाकपिम्—परम पुरुष विष्णु को जो हर एक का पालन करने वाले तथा सबके कष्टों को दूर करने वाले हैं; पुरुषम्—परम पुरुष को; पुरुष-सूक्तेन—पुरुषसूक्त नामक वैदिक मंत्र से; उपतस्थे—पूजा किया; समाहित:—पूर्ण मनोयोग से ।.
 
अनुवाद
 
 क्षीर सागर के तट पर पहुँच कर सारे देवताओं ने समस्त ब्रह्माण्ड के स्वामी, समस्त देवताओं के परम ईश तथा हर एक का पालन करने वाले और उनके दुखों को दूर करने वाले भगवान् विष्णु की पूजा की। उन्होंने बड़े ही मनोयोग से पुरुषसूक्त नामक वैदिक मंत्रों के पाठ द्वारा क्षीर सागर में शयन करने वाले भगवान् विष्णु की पूजा की।
 
तात्पर्य
 सारे देवता यथा ब्रह्माजी, शिवजी, देवराज इन्द्र, चन्द्र तथा सूर्य पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् के अधीन हैं। देवताओं के अतिरिक्त मानव समाज में भी अनेक प्रभावशाली व्यक्ति हैं, जो विविध व्यापारों या प्रतिष्ठानों का अधीक्षण करते हैं। किन्तु भगवान् विष्णु तो देवताओं के भी ईश्वर (परमेश्वर ) हैं। वे परम पुरुष परमात्मा हैं। जैसाकि ब्रह्म-संहिता (५.१) में पुष्टि हुई है—ईश्वर: परम: कृष्ण: सच्चिदानन्दविग्रह:—“गोविन्द नाम से विख्यात कृष्ण परम नियन्ता हैं। उनका शरीर सत्, चित् तथा आनन्द से युक्त है।” न तो कोई भगवान् के तुल्य है, न ही उनसे बढक़र है इसीलिए यहाँ पर जगन्नाथ, देव-देव, वृषाकपि तथा पुरुष जैसे शब्दों से उनका वर्णन किया गया है। भगवान् विष्णु की श्रेष्ठता की पुष्टि भगवद्गीता (१०.१२) में अर्जुन के निम्नलिखित कथन से भी होती है—
परं ब्रह्म परं धाम पवित्रं परमं भवान्।

पुरुषं शाश्वतं दिव्यमादिदेवमजं विभुम् ॥

“आप परम ब्रह्म, परम धाम, शुद्धकर्ता, परम सत्य तथा नित्य दैवी पुरुष हैं। आप आदि भगवान् हैं, दिव्य और शाश्वत हैं और अजन्मा हैं तथा सर्वव्यापक सौन्दर्य हैं।” कृष्ण आदि पुरुष (गोविन्दमादि पुरुषं तमहं भजामि ) हैं। विष्णु भगवान् कृष्ण के स्वांश हैं और सारे विष्णुतत्त्व परमेश्वर तथा देवदेव हैं।

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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥