श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 1: भगवान् श्रीकृष्ण का अवतार: परिचय  »  श्लोक 31-32

 
श्लोक
चतु:शतं पारिबर्हं गजानां हेममालिनाम् ।
अश्वानामयुतं सार्धं रथानां च त्रिषट्‌शतम् ॥ ३१ ॥
दासीनां सुकुमारीणां द्वे शते समलङ्कृते ।
दुहित्रे देवक: प्रादाद् याने दुहितृवत्सल: ॥ ३२ ॥
 
शब्दार्थ
चतु:-शतम्—चार सौ; पारिबर्हम्—दहेज; गजानाम्—हाथियों के; हेम-मालिनाम्—सोने के हारों से सजे; अश्वानाम्—घोड़ों के; अयुतम्—दस हजार; सार्धम्—साथ में; रथानाम्—रथों के; च—तथा; त्रि-षट्-शतम्—छह सौ का तिगुना, अठारह सौ; दासीनाम्—दासियों के; सु-कुमारीणाम्—अत्यन्त जवान तथा सुन्दर अविवाहित लड़कियाँ; द्वे—दो; शते—सौ; समलङ्कृते— गहनों से सज्जित; दुहित्रे—अपनी पुत्री को; देवक:—राजा देवक; प्रादात्—भेंट स्वरूप दिया; याने—जाते समय; दुहितृ वत्सल:—अपनी पुत्री देवकी को अत्यधिक चाहने वाला ।.
 
अनुवाद
 
 देवकी का पिता राजा देवक अपनी पुत्री को अत्यधिक स्नेह था। अतएव जब देवकी तथा उसका पति घर से विदा होने लगे तो उसने दहेज में सोने के हारों से सुसज्जित चार सौ हाथी दिए। साथ ही दस हजार घोड़े, अठारह हजार रथ तथा दो सौ अत्यन्त सुन्दर तथा गहनों से अच्छी तरह अलंकृत युवा दासियाँ दीं।
 
तात्पर्य
 वैदिक सभ्यता में अपनी पुत्री को दहेज देने की प्रथा दीर्घकाल से चली आ रही है। आज भी, उसी प्रथा का पालन करते हुए धनवान पिता अपनी पुत्री को भरपूर दहेज देता है। चूँकि पुत्री को पिता की सम्पत्ति में अधिकार नहीं मिलता इसलिए वत्सल पिता अपनी पुत्री के विवाह के अवसर पर यथाशक्ति दहेज देता है। इसलिए वैदिक प्रथा के अनुसार दहेज अवैध नहीं है। किन्तु देवक ने देवकी को जो दहेज दिया वह सामान्य नहीं था। चूँकि देवक राजा था अतएव अपने राजसी-पद के अनुसार उसने उपयुक्त दहेज दिया। यहाँ तक
कि सामान्य व्यक्ति, विशेष रूप से कुलीन ब्राह्मण, क्षत्रिय या वैश्य से आशा की जाती है कि वह दिल खोल कर यथेष्ठ दहेज दे। विवाह के तुरन्त बाद पुत्री अपने ससुराल जाती है और यह भी प्रथा है कि अपनी बहन के प्रति प्रेभभाव दर्शाने के लिए दुलहिन का भाई उसके तथा बहनोई के साथ-साथ जाय। कंस इसी प्रथा का पालन कर रहा था। वर्णाश्रम धर्म समाज में, जिसे आज गलती से हिन्दू समाज कहा जाता है, ये पुराने रीति-रिवाज पाए जाते हैं। इन पुराने रीति-रिवाजों का यहाँ पर सुन्दर ढंग से वर्णन हुआ है।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥