श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 1: भगवान् श्रीकृष्ण का अवतार: परिचय  »  श्लोक 4

 
श्लोक
निवृत्ततर्षैरुपगीयमानाद्भवौषधाच्छ्रोत्रमनोऽभिरामात् ।
क उत्तमश्लोकगुणानुवादात्पुमान् विरज्येत विना पशुघ्नात् ॥ ४ ॥
 
शब्दार्थ
निवृत्त—मुक्त; तर्षै:—काम या भौतिक कार्यों से; उपगीयमानात्—वर्णित या गाया जाने वाला; भव-औषधात्—भौतिक रोग की सही औषधि से; श्रोत्र—कानों से सुनने की विधि; मन:—मन के लिए विचार का विषय; अभिरामात्—ऐसे महिमा-वर्णन की सुहावनी ध्वनि से; क:—कौन; उत्तमश्लोक—भगवान् का; गुण-अनुवादात्—ऐसे कार्यों का वर्णन करने से; पुमान्— मनुष्य; विरज्येत—अपने को विलग रख सकता है; विना—रहित; पशु-घ्नात्—कसाई अथवा अपने आप का ही वध करने वाले से ।.
 
अनुवाद
 
 भगवान् की महिमा का वर्णन परम्परा-पद्धति से किया जाता है अर्थात् यह अध्यात्मिक गुरु से शिष्य तक पहुँचाया जाता है। ऐसे वर्णन का आनन्द उन लोगों को मिलता है, जो इस जगत के मिथ्या, क्षणिक वर्णन में रुचि नहीं रखते। भगवान् का गुणगान जन्म-मृत्यु के चक्कर में फँसे बद्धजीवों के लिए उपयुक्त औषधि है। अतएव कसाई (पशुघाती) या अपने को ही मारने वाले (आत्मघाती) के अतिरिक्त भगवान् की महिमा को सुनना कौन नहीं चाहेगा?
 
तात्पर्य
 भारत में सामान्य लोगों के बीच यह आम प्रथा है कि बारम्बार जन्म-मरण के रोग से छुटकारा पाने के लिए वे भगवद्गीता या श्रीमद्भागवत से कृष्ण के विषय में सुनते हैं। यद्यपि अब भारत पतित हो चुका है, किन्तु यह समाचार मिलते ही कि अमुक व्यक्ति भगवद्गीता या श्रीमद्भागवत पर बोलेगा, अब भी हजारों लोग सुनने के लिए एकत्र हो जाते हैं। किन्तु यह श्लोक इंगित करता है कि भगवद्गीता तथा श्रीमद्भागवत का ऐसा पाठ ऐसे व्यक्तियों द्वारा किया जाना चाहिए जो भौतिक इच्छाओं से पूरी तरह मुक्त हो चुके हों (निवृत्ततर्षै )। इस जगत में ब्रह्मा से लेकर एक क्षुद्र चींटी तक सारे जीव इन्द्रियभोग की भौतिक इच्छा से पूर्ण हैं और हर प्राणी इन्द्रियतृप्ति में लगा हुआ है, किन्तु इस तरह लगे रहने पर कृष्णकथा के महत्त्व को, चाहे वह भगवद्गीता के रूप में हो, चाहे श्रीमद्भागवत के रूप में, पूरी तरह नहीं समझा जा सकता।
यदि हम मुक्तपुरुषों के मुख से भगवान् की महिमा के विषय में सुनें तो इससे भवबन्धन से अवश्य छूट सकते हैं, किन्तु श्रीमद्भागवत के पेशेवर वाचकों से सुनने पर वास्तव में मुक्ति-प्राप्ति में कोई सहायता नहीं मिल सकती है। कृष्णकथा अतीव सरल है। भगवद्गीता में कहा गया है कि कृष्ण परमेश्वर हैं। वे स्वयं बतलाते हैं—मत्त: परतरं नान्यत् किञ्चिदस्ति धनञ्जय—हे अर्जुन! मुझसे श्रेष्ठ कोई सत्य नहीं है (भगवद्गीता ७.७)। केवल इतना ही जान लेने से कि कृष्ण परमेश्वर हैं, मुक्त हुआ जा सकता है। किन्तु इस कलियुग में लोग असली लाभ से वंचित रहते हैं क्योंकि वे ऐसे धूर्त व्यक्तियों से भगवद्गीता सुनना पसन्द करते हैं, जो भगवद्गीता को यथारूप में प्रस्तुत न करके उसे अपनी इच्छानुसार तोड़ते-मरोड़ते हैं। बड़े-बड़े विद्वान, राजनीतिज्ञ, दार्शनिक तथा वैज्ञानिक अपने ही दूषित तरीके से भगवद्गीता पर प्रवचन करते हैं और सामान्य लोग इन्हीं से सुनते हैं क्योंकि वे किसी भक्त से भगवान् के गुणानुवाद को सुनने में रुचि नहीं रखते। भक्त वह है, जो भगवान् की सेवा करने के अतिरिक्त भगवद्गीता तथा श्रीमद्भागवत का पाठ करते हुए कोई अन्य प्रयोजन नहीं रखता। इसीलिए श्री चैतन्य महाप्रभु ने हम सबको सलाह दी है कि स्वरूपसिद्ध व्यक्ति से ही भगवान् का गुणानुवाद सुना जाय (भागवत परो दिय भागवत स्थाने )। जब तक कोई कृष्णभावनामृत विज्ञान में सिद्धात्मा न हो तब तक नवदीक्षित को चाहिए कि वह उससे भगवान् के विषय में सुनाने के लिए न कहे क्योंकि श्रील सनातन गोस्वामी ने पद्मपुराण से निम्नलिखित उद्धरण देते हुए ऐसा करने से मना किया है—

अवैष्णव मुखोद्गीर्णं पूतं हरिकथामृतम्।

श्रवणं नैव कर्तव्यं सर्पोच्छिष्टं यथा पय: ॥

जो वैष्णव-आचरण वाला न हो उससे कथा नहीं सुननी चाहिए। वैष्णव तो निवृत्त-तृष्ण होता है—उसका कोई भौतिक उद्देश्य नहीं होता क्योंकि उसका एकमात्र उद्देश्य कृष्णभावनामृत का प्रचार करना होता है। तथाकथित विद्वान, दार्शनिक तथा राजनीतिज्ञ स्वार्थवश भगवद्गीता के अर्थ को तोड़- मरोड़ कर अपना उल्लू सीधा करना चाहते हैं। इसीलिए यह श्लोक सावधान करता है कि कृष्णकथा का वाचन वही करे जो निवृत्त-तृष्ण हो। शुकदेव गोस्वामी श्रीमद्भागवत के आदर्श उपयुक्त वाचक हैं और मृत्यु का सामना करने के पूर्व अपना राज्य तथा परिवार को किसी उद्देश्य से छोडऩे वाले परीक्षित महाराज आदर्श श्रोता हैं। श्रीमद्भागवत का सुयोग्य वाचक बद्धजीवों को सही औषधि (भवौषधि ) प्रदान करता है। इसीलिए कृष्णभावनामृत आन्दोलन ऐसे योग्य प्रचारकों को प्रशिक्षित करने में प्रयत्नशील है, जो सारे जगत में श्रीमद्भागवत तथा भगवद्गीता का वाचन कर सकें जिससे विश्वभर के सामान्यजन इस आन्दोलन का लाभ उठा सकें और भौतिक संसार के तीनों तापों से छूट सकें।

भगवद्गीता के आदेश तथा श्रीमद्भागवत के वर्णन इतने मनोहारी हैं कि भौतिक संसार के तीनों तापों से तप्त प्राय: प्रत्येक व्यक्ति इन ग्रंथों में से भगवान् की महिमा को सुनना चाहेगा और मुक्ति के मार्ग में लाभ उठाना चाहेगा। किन्तु दो प्रकार के लोग कभी-भी भगवद्गीता तथा श्रीमद्भागवत के सन्देश को सुनने में रुचि नहीं लेंगे—एक वे जो आत्महत्या करने पर तुले हैं और दूसरे वे जो अपने स्वाद के लिए गौवों तथा अन्य पशुओं का वध करने पर तुले हुए हैं। यद्यपि ऐसे लोग भागवत-सप्ताह के समय श्रीमद्भागवत सुनने का दिखावा करते हैं, किन्तु यह कर्मीजनों की दूसरी सृष्टि है जिन्हें ऐसे कृत्य से कोई लाभ नहीं मिल सकता। इस सम्बन्ध में पशुघ्नात् शब्द महत्त्वपूर्ण है। पशुघ्न का अर्थ है “कसाई।” उच्चत्तर लोकों में जाने के लिए कर्मकाण्डी व्यक्तियों को यज्ञ करते समय पशुओं का वध करना होता है इसीलिए भगवान् बुद्धदेव ने वेदों के प्रमाण का तिरस्कार किया क्योंकि वे पशुबलि को रोकना चाहते थे जिनकी वैदिक अनुष्ठानों में संस्तुति की गई है।

निन्दसि यज्ञविधेरहह श्रुतिजातं सदयहृदय दर्शितपशुघातं केशव धृतबुद्धशरीर जय जगदीश हरे (गीत गोविन्द ) यद्यपि वैदिक उत्सवों में पशुबलि को मान्यता प्राप्त है, किन्तु ऐसे उत्सवों के लिए जो व्यक्ति पशुओं का वध करते हैं, वे कसाई (पशुघ्न ) माने जाते हैं। भला कसाइयों को कृष्णभावनामृत में कैसे रुचि हो सकती है जब उन्हें भौतिक आकर्षण मिला रहता है? उनकी एकमात्र रुचि नश्वर शरीर के लिए सुविधाएँ उत्पन्न करने में होती है—

भोगैश्वर्यप्रसक्तानां तयापहृतचेतसाम्।

व्यवसायात्मिका बुद्धि: समाधौ न विधीयते ॥

“जो लोग इन्द्रियभोग तथा भौतिक ऐश्वर्य के प्रति आसक्त हैं और जो ऐसी वस्तुओं से मोहग्रस्त रहते हैं उनके मन में भगवान् की भक्ति के लिए दृढ़ संकल्प नहीं बन पाता।” (भगवद्गीता २.४४) श्रील नरोत्तमदास ठाकुर कहते हैं—

मनुष्य जन्म पाइया, राधा-कृष्ण ना भजिया जानिया शुनिया विष खाइनु जो कृष्णभावनाभावित नहीं है और इस तरह जो भगवान् की सेवा में अपने को नहीं लगाता वह भी पशुघ्न है क्योंकि वह जानबूझ कर विष पीता है। ऐसे व्यक्ति को कृष्णकथा में रुचि नहीं होती क्योंकि उसमें इन्द्रियतृप्ति की लालसा शेष रहती है। वह निवृत्ततृष्ण नहीं होता। जैसाकि कहा गया है—त्रैवर्गिकास्ते पुरुषा विमुरवा हरिमेधस:। जिन्हें त्रिवर्ग अर्थात् धर्म, अर्थ तथा काम में रुचि रहती है वे भौतिक पद प्राप्त करने तथा उसके द्वारा इन्द्रियतृप्ति के लिए अच्छी-अच्छी सुविधाएँ प्राप्त करने के निमित्त धार्मिक होते हैं। ऐसे लोग अपने को जानबूझ कर जन्म-मरण के चक्र में डालकर अपनी हत्या करते हैं। वे कृष्णभावनामृत में कभी-भी रुचि नहीं ले सकते।

कृष्णकथा के लिए वक्ता तथा श्रोता होना चाहिए और ये दोनों कृष्णभावनामृत में तभी रुचि ले सकेंगे जब उन्हें भौतिक कथाओं में रुचि न हो। वास्तव में यह हर कोई देख सकता है कि जो लोग कृष्णभावनाभावित हैं उनमें यह प्रवृत्ति स्वत: उत्पन्न होती है। यद्यपि कृष्णभावनामृत आन्दोलन के भक्तगण तरुण व्यक्ति हैं, किन्तु वे भौतिकतावादी अखबार, पत्रिकाएँ इत्यादि नहीं पढ़ते क्योंकि उन्हें ऐसी कथाओं में कोई रुचि नहीं होती (निवृत्ततर्षै )। वे देहात्मबुद्धि का सर्वथा परित्याग कर देते हैं। गुरु उत्तमश्लोक अर्थात् पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् विषयक कथाओं को कहता है और शिष्य ध्यान से उन्हें सुनता है। जब तक दोनों भौतिक इच्छाओं से मुक्त नहीं हो लेते, तब तक उन्हें कृष्णभावनामृत की कथाओं में रुचि नहीं हो सकती। गुरु तथा शिष्य को कृष्ण के अतिरिक्त और कुछ समझने की आवश्यकता नहीं रहती क्योंकि कृष्ण को समझने तथा कृष्ण के विषय में बातें करने मात्र से ही व्यक्ति पूर्णतया विद्वान बन सकता है (यस्मिन् विज्ञाते सर्वमेवं विज्ञातं भवति )। भगवान् हर एक के हृदय में आसीन रहता है और उनकी कृपा से भक्त तो भगवान् से ही सीधे आदेश प्राप्त करता है जैसाकि भगवद्गीता (१५.१५) में भगवान् ने कहा है—

सर्वस्य चाहं हृदि सन्निविष्टो मत्त: स्मृतिर्ज्ञानमपोहनं च।

वेदैश्च सर्वैरहमेव वेद्यो वेदान्तकृद् वेदविदेव चाहम् ॥

“मैं हर एक के हृदय में आसीन हूँ और मुझी से स्मृति, ज्ञान तथा विस्मृति उत्पन्न होते हैं। सारे वेदों के द्वारा मैं ही वेद्य हूँ। मैं ही वेदान्त का रचयिता और वेदों का ज्ञाता हूँ।” कृष्णभावनामृत इतना उच्च है कि कृष्णभावनाभावित व्यक्ति गुरु के निर्देशन से श्रीमद्भागवत, भगवद्गीता तथा अन्य वैदिक साहित्य में प्राप्य कृष्णकथा को पढक़र तुष्ट रहता है। जब कृष्ण के विषय में केवल बातें करना इतना सुहावना लगता है, तो फिर कृष्ण की सेवा करना कितना सुहावना होगा, इसकी कल्पना की जा सकती है।

जब मुक्तगुरु तथा उसके शिष्य के मध्य कृष्णकथा पर वार्ताएँ होती हैं, तो अन्य लोग भी कभी कभी इन कथाओं को सुनकर लाभ उठाते हैं। ये कथाएँ जन्म तथा मृत्यु के चक्र को रोकने में रामबाण औषधि का कार्य करती हैं। बारम्बार जन्म तथा मृत्यु का चक्र, जिससे मनुष्य को पुन:-पुन: विभिन्न शरीर ग्रहण करने पड़ते हैं, भव या भवरोग कहलाता है। यदि कोई व्यक्ति इच्छा या अनिच्छा से कृष्णकथा सुनता है, तो उसका भवरोग अर्थात् जन्म-मरण का रोग निश्चय ही जाता रहता है। इसलिए कृष्णकथा को भवौषधि—जन्म-मृत्यु के चक्र को रोकने की औषधि—कहा गया है। कर्मीजन जो भौतिक इन्द्रियतृप्ति में आसक्त हैं, सामान्यतया अपनी भौतिक इच्छाओं का परित्याग नहीं कर सकते, किन्तु कृष्णकथा ऐसी रामबाण औषधि है कि कृष्णकथा सुनने के लिए प्रेरित होने पर वह इस रोग से निश्चित रूप से मुक्त हो जाता है। इसके ज्वलन्त उदाहरण ध्रुव महाराज हैं, जो अपनी तपस्या के बाद अत्यन्त तुष्ट थे। जब भगवान् ने उन्हें वर देना चाहा तो ध्रुव ने वर लेने से मना कर दिया। स्वामिन् कृतार्थोऽस्मि वरं न याचे—हे प्रभु! मैं पूरी तरह से तुष्ट हो गया हूँ, मुझे इन्द्रियतृप्ति के लिए कोई वर नहीं चाहिए। हम देख रहे हैं कि कृष्णभावनामृत आन्दोलन में युवकों तथा युवतियों तक ने अपनी बुरी से बुरी आदतें जैसे अवैध यौन, मांसाहार, नशा तथा जुआ खेलना छोड़ दी हैं। चूँकि कृष्णभावनामृत इतना प्रबल है कि इससे उन्हें पूर्ण सन्तोष मिलता है अतएव वे भौतिक इन्द्रियतृप्ति में रुचि नहीं लेते।

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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥