श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 1: भगवान् श्रीकृष्ण का अवतार: परिचय  »  श्लोक 5-7

 
श्लोक
पितामहा मे समरेऽमरञ्जयै-र्देवव्रताद्यातिरथैस्तिमिङ्गिलै: ।
दूरत्ययं कौरवसैन्यसागरंकृत्वातरन् वत्सपदं स्म यत्‍प्लवा: ॥ ५ ॥
द्रौण्यस्त्रविप्लुष्टमिदं मदङ्गंसन्तानबीजं कुरुपाण्डवानाम् ।
जुगोप कुक्षिं गत आत्तचक्रोमातुश्च मे य: शरणं गताया: ॥ ६ ॥
वीर्याणि तस्याखिलदेहभाजा-मन्तर्बहि: पूरुषकालरूपै: ।
प्रयच्छतो मृत्युमुतामृतं चमायामनुष्यस्य वदस्व विद्वन् ॥ ७ ॥
 
शब्दार्थ
पितामहा:—पाँचों पाण्डव, जो मेरे बाबा हैं; मे—मेरे; समरे—कुरुक्षेत्र के युद्धस्थल में; अमरम् जयै:—युद्धभूमि में देवताओं पर विजय प्राप्त करने वाले योद्धाओं समेत; देवव्रत-आद्य—भीष्मदेव तथा अन्य; अतिरथै:—महा सेनापतियों के साथ; तिमिङ्गिलै:—तिमिंगिल (बड़ी मछली) के समान; दुरत्ययम्—दुर्लंघ्य; कौरव-सैन्य-सागरम्—कौरवों के एकत्र सैनिकों के सागर को; कृत्वा—मानकर; अतरन्—पार कर लिया; वत्स-पदम्—गो खुर के समान; स्म—था; यत्-प्लवा:—कृष्ण की चरणकमल रूपी नाव का आश्रय; द्रौणि—अश्वत्थामा के; अस्त्र—ब्रह्मास्त्र से; विप्लुष्टम्—आक्रमण करके जलाया गया; इदम्—यह; मत्-अङ्गम्—मेरा शरीर; सन्तान-बीजम्—एकमात्र बचा हुआ बीज, वंश का अन्तिम उत्तराधिकारी; कुरु- पाण्डवानाम्—कौरवों तथा पाण्डवों का (कुरुक्षेत्र में मेरे अतिरिक्त सभी लोग मारे जा चुके हैं); जुगोप—शरण दी; कुक्षिम्— गर्भ में; गत:—स्थापित; आत्त-चक्र:—हाथ में चक्र लिए; मातु:—माता का; च—भी; मे—मेरी; य:—जो भगवान्; शरणम्—शरण; गताया:—ग्रहण कर ली है; वीर्याणि—दिव्य गुणों का गान; तस्य—उस (भगवान्) का; अखिल-देह भाजाम्—समस्त देहधारी जीवों का; अन्त: बहि:—भीतर तथा बाहर; पूरुष—परम पुरुष का; काल-रूपै:—नित्य समय के रूपों में; प्रयच्छत:—देने वाला; मृत्युम्—मृत्यु को; उत—ऐसा कहा जाता है; अमृतम् च—तथा शाश्वत जीवन; माया- मनुष्यस्य—भगवान् का, जो अपनी शक्ति से मनुष्य रूप में प्रकट हुए हैं; वदस्व—कृपा करके कहें; विद्वन्—हे विद्वान (शुकदेव गोस्वामी) ।.
 
अनुवाद
 
 कृष्ण के चरणकमल रूपी नाव को लेकर मेरे बाबा अर्जुन तथा अन्यों ने उस कुरुक्षेत्र युद्धस्थल रूपी सागर को पार कर लिया जिसमें भीष्मदेव जैसे सेनापति उन बड़ी-बड़ी मछलियों के तुल्य थे, जो उन्हें आसानी से निगल गई होतीं। मेरे पितामहों ने भगवान् श्रीकृष्ण की कृपा से इस दुर्लंघ्य सागर को इतनी सरलता से पार कर लिया मानो कोई गोखुर का चिन्ह हो। चूँकि मेरी माता ने सुदर्शन चक्रधारी भगवान् श्रीकृष्ण के चरणकमलों की शरण ग्रहण की थी अत: उन्होंने उनके गर्भ में प्रवेश करके मुझे बचा लिया जो कौरवों तथा पाण्डवों का अन्तिम बचा हुआ उत्तराधिकारी था और जिसे अश्वत्थामा ने अपने ब्रह्मास्त्र से नष्टप्राय कर दिया था। भगवान् कृष्ण ने समस्त देहधारी जीवों के भीतर तथा बाहर शाश्वत काल के रूपों में—यथा परमात्मा तथा विराट रूपों में—अपनी शक्ति से प्रकट होकर हर एक को क्रूर मृत्यु के रूप में या जीवन के रूप में मोक्ष प्रदान किया। कृपया उनके दिव्य गुणों का वर्णन करके मुझे प्रबुद्ध कीजिए।
 
तात्पर्य
 जैसाकि श्रीमद्भागवत (१०.१४.५८) में में कहा गया है—
समाश्रिता ये पदपल्लवप्लवं महत्पदं पुण्ययशो मुरारे:।

भवाम्बुधिर्वत्सपदं परं पदं पदं पदं यद् विपदां न तेषाम् ॥

“जिसने विराट जगत के आश्रय तथा मुरारि अर्थात् मुर नामक असुर के शत्रु, भगवान् के चरणकमल रूपी नाव को पकड़ लिया है उसके लिए यह भवसागर गोखुर में भरे जल के समान है। उसका लक्ष्य परं पदं अर्थात् वैकुण्ठ होता है जहाँ भौतिक कष्टों का नामोनिशान नहीं रहता, न कि वह स्थान जहाँ पग-पग पर संकट है।”

जो व्यक्ति भगवान् श्रीकृष्ण के चरणों की शरण लेता है उसे तुरन्त ही भगवान् सुरक्षा प्रदान करते हैं। भगवद्गीता (१८.६६) में भगवान् वचन देते हैं—अहं त्वां सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुच:—मैं तुम्हें सारे पापों से उबार लूँगा; तुम डरो मत—भगवान् कृष्ण की शरण में आने से मनुष्य सबसे सुरक्षित आश्रय प्राप्त कर लेता है। इस तरह जब पाण्डवों ने कृष्ण के चरणकमलों की शरण ग्रहण कर ली तो वे कुरुक्षेत्र की युद्धभूमि में सुरक्षित दल में आ गये। इसीलिए परीक्षित महाराज अपने जीवन के अन्तिम दिनों में कृष्ण का चिन्तन करते हुए कृतज्ञता का अनुभव कर रहे थे। कृष्णभावनामृत का यह आदर्श फल है—अन्ते नारायणस्मृति:। यदि मृत्यु के समय कोई कृष्ण का स्मरण कर सके तो उसका जीवन सफल हो जाता है। इसीलिए परीक्षित महाराज ने अपने जीवन के अन्तिम दिनों में कृष्ण की अनेक कृतज्ञताओं के कारण कृष्ण का निरन्तर चिन्तन करने की बुद्धिमानी की। कृष्ण ने महाराज परीक्षित के बाबाओं को कुरुक्षेत्र के युद्धस्थल में बचाया था और कृष्ण ने स्वयं महाराज परीक्षित की उस समय रक्षा की थी जब अश्वत्थामा ने ब्रह्मास्त्र से उन पर आक्रमण किया था। पाण्डव परिवार के लिए कृष्ण एक मित्र तथा आराध्यदेव के तुल्य थे। भगवान् कृष्ण का पाण्डवों के साथ व्यक्तिगत संपर्क होने के अतिरिक्त, कृष्ण सारे जीवों के परमात्मा हैं और हर एक को मुक्ति प्रदान करने वाले हैं—भले ही कोई शुद्ध भक्त हो या न हो। उदाहरणार्थ, कंस बिलकुल भक्त नहीं था फिर भी उसे मारने के बाद कृष्ण ने उसे मोक्ष प्रदान किया। कृष्णभावनामृत हर एक के लिए लाभप्रद है, चाहे वह शुद्ध भक्त हो या अभक्त। कृष्णभावनामृत की यही महिमा है। यह विचार कर भला कौन ऐसा होगा जो कृष्ण के चरणकमलों की शरण ग्रहण नहीं करेगा? इस श्लोक में कृष्ण को मायामनुष्य कहा गया है क्योंकि वे बिलकुल मनुष्य की ही तरह अवतरित होते हैं। वे कर्मियों या सामान्य जीवों की तरह यहाँ आने के लिए बाध्य नहीं हैं प्रत्युत वे अपनी अन्तरंगा शक्ति के द्वारा (सम्भवाम्यात्ममायया ) पतित बद्धजीवों पर कृपा दिखाने के लिए प्रकट होते हैं। कृष्ण अपने सच्चिदानन्द विग्रह रूप में सदैव स्थित रहते हैं और जो कोई उनकी सेवा करता है, वह भी अपने मूल आध्यात्मिक स्वरूप में स्थित हो जाता है (स्वरूपेण व्यवस्थिति:)। यही मानव जीवन की सर्वोच्च सिद्धि है।

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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥