श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 1: भगवान् श्रीकृष्ण का अवतार: परिचय  »  श्लोक 53

 
श्लोक
प्रसन्नवदनाम्भोजो नृशंसं निरपत्रपम् ।
मनसा दूयमानेन विहसन्निदमब्रवीत् ॥ ५३ ॥
 
शब्दार्थ
प्रसन्न-वदन-अम्भोज:—वसुदेव, जो बाहर से परम प्रसन्न लग रहे थे; नृशंसम्—अत्यन्त क्रूर; निरपत्रपम्—निर्लज्ज कंस को; मनसा—मन से; दूयमानेन—चिन्ता तथा दुख से पूर्ण; विहसन्—बाहर से हँसते हुए; इदम् अब्रवीत्—इस प्रकार बोले ।.
 
अनुवाद
 
 वसुदेव का मन चिन्ता से पूर्ण था क्योंकि उनकी पत्नी संकट में थीं, किन्तु क्रूर, निर्लज्ज तथा पापी कंस को प्रसन्न करने के उद्देश्य से बनावटी हँसी लाते हुए वे इस प्रकार बोले।
 
तात्पर्य
 कभी-कभी संकटकालीन स्थिति में कपट से काम चलाना पड़ता है जैसाकि वसुदेव ने अपनी पत्नी को बचाने के लिए किया। यह भौतिक जगत बहुत ही जटिल है और अपना कर्तव्य निभाने के लिए ऐसी दोहरी चाल अपनानी पड़ती है। वसुदेव ने कृष्ण को जन्म देने के लिए अपनी पत्नी को बचाने के लिए हर सम्भव प्रयास किए। इससे सूचित होता है कि कृष्ण तथा उनके हितों की रक्षा के लिए दोहरी चाल से काम लिया जा सकता है। पूर्व-घोषित व्यवस्था के अनुसार कंस का वध करने के लिए कृष्ण को वसुदेव तथा देवकी से जन्म लेना था। अत: वसुदेव को इस स्थिति से निपटने
के लिए हर प्रयत्न करना पड़ा। यद्यपि सारी घटनाएँ कृष्ण द्वारा पूर्वनियोजित होती हैं, किन्तु भक्त को कृष्ण की सेवा के लिए हर सम्भव प्रयास करना होता है। कृष्ण स्वयं सर्वशक्तिमान हैं किन्तु इसका अर्थ यह नहीं कि भक्त को हाथ पर हाथ धरकर बैठ जाना चाहिए और सबकुछ कृष्ण पर ही छोड़ देना चाहिये। भगवद्गीता से भी यही उपदेश प्राप्त होता है। यद्यपि अर्जुन के लिए कृष्ण सब कुछ कर रहे थे, किन्तु अर्जुन कभी अहिंसक की तरह आलसी बन कर बैठा नहीं। वह युद्ध में यथाशक्ति लडऩे और विजयी बनने का प्रयास करता रहा।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥