श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 1: भगवान् श्रीकृष्ण का अवतार: परिचय  »  श्लोक 56

 
श्लोक
अथ काल उपावृत्ते देवकी सर्वदेवता ।
पुत्रान् प्रसुषुवे चाष्टौ कन्यां चैवानुवत्सरम् ॥ ५६ ॥
 
शब्दार्थ
अथ—तत्पश्चात्; काले—समय बीतने पर; उपावृत्ते—परिपक्व होने पर; देवकी—कृष्ण के पिता वसुदेव की पत्नी ने; सर्व देवता—देवकी, जिसके लिए सारे देवता तथा स्वयं भगवान् प्रकट हुए; पुत्रान्—पुत्रों को; प्रसुषुवे—उत्पन्न किया; च—तथा; अष्टौ—आठ; कन्यां च—तथा एक कन्या सुभद्रा को भी; एव—निस्सन्देह; अनुवत्सरम्—वर्षानुवर्ष, प्रतिवर्ष ।.
 
अनुवाद
 
 तत्पश्चात् प्रति-वर्ष समय आने पर ईश्वर तथा अन्य देवताओं की माता देवकी ने एक शिशु को जन्म दिया। इस तरह एक के बाद एक उनके आठ पुत्र तथा सुभद्रा नामक एक कन्या उत्पन्न हुई।
 
तात्पर्य
 गुरु को कभी-कभी सर्वदेवमयोगुरु कहकर महिमामंडित किया जाता है (भागवत ११.७.२७)। आध्यात्मिक गुरु की कृपा से विभिन्न प्रकार के देवों को समझा जा सकता है। देव शब्द ईश्वर का सूचक है, जो समस्त देवताओं (देवों) का मूल उद्गम है। भगवद्गीता (१०.२) में भगवान् कहते हैं—अहं आदिर्हि देवानाम्—मैं समस्त देवों का उद्गम हूँ। आदि पुरुष भगवान् विष्णु अपने विभिन्न रूपों में विस्तार करते हैं। तदैक्षत बहुस्याम् (छान्दोग्य उपनिषद् ६.२.३)। वे ही अनेक रूपों में विस्तीर्ण हो गए। अद्वैतम् अच्युतम् अनादिम् अनन्तरूपम् (ब्रह्म-संहिता ५.३३)। स्वरूप की विभिन्न कोटियाँ स्वांश तथा विभिन्नांश कहलाती हैं। स्वांश अथवा
विष्णु-तत्त्व भगवान् होते हैं और विभिन्नांश जीवतत्त्व होते हैं, जो भगवान् के अंश हैं (ममैवांशो जीवलोके जीवभूत: सनातन:)। यदि हम कृष्ण को भगवान् मानकर उनकी पूजा करते हैं, तो भगवान् के सारे अंश स्वत: पुज जाते हैं। सर्वार्हणमच्युतेज्या (भागवत ४.३१.१४)। कृष्ण अच्युत कहलाते हैं (सेनयोरुभयोर्मध्ये रथं स्थापय मेऽच्युत )। अच्युत कृष्ण की पूजा करने से सारे देवताओं की स्वत: पूजा हो लेती है। तब न तो विष्णु-तत्त्व न ही जीव-तत्त्व को अलग-अलग पूजने की आवश्यकता रह जाती है। यदि कृष्ण पर ध्यान एकाग्र किया जाए तो हर एक की पूजा हो जाती है। अत: कृष्ण को जन्म देने के कारण माता देवकी को सर्वदेवता कहा गया है।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥