श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 1: भगवान् श्रीकृष्ण का अवतार: परिचय  »  श्लोक 57

 
श्लोक
कीर्तिमन्तं प्रथमजं कंसायानकदुन्दुभि: ।
अर्पयामास कृच्छ्रेण सोऽनृतादतिविह्वल: ॥ ५७ ॥
 
शब्दार्थ
कीर्तिमन्तम्—कीर्तिमान नाम से; प्रथम-जम्—पहले पहल जन्मा शिशु; कंसाय—कंस को; आनकदुन्दुभि:—वसुदेव द्वारा; अर्पयाम् आस—दे दिया गया; कृच्छ्रेण—बड़ी मुश्किल से; स:—वह (वसुदेव); अनृतात्—झूठा बनने के भय से, वचन भंग करने से; अति-विह्वल:—अत्यन्त भयभीत ।.
 
अनुवाद
 
 वसुदेव अत्यधिक विह्वल थे कि कहीं उनका वचन भंग हुआ तो वे झूठे साबित होंगे। इस तरह उन्होंने बड़ी ही वेदना के साथ अपने प्रथम पुत्र कीर्तिमान को कंस के हाथों में सौंप दिया।
 
तात्पर्य
 वैदिक पद्धति में, ज्यों ही कोई बच्चा, विशेषकर पुत्र, उत्पन्न होता है, तो पिता विद्वान ब्राह्मणों को बुलवाता है और बच्चे की कुंडली के अनुसार उसका नामकरण किया जाता है। इसे नामकरण संस्कार कहते हैं। इस तरह वर्णाश्रम धर्म पद्धति में
दस संस्कार होते हैं जिनमें से नामकरण संस्कार एक है। यद्यपि वसुदेव के प्रथम पुत्र को कंस के हाथों सौंप दिया जाना था, किन्तु उसका नामकरण संस्कार सम्पन्न हुआ और उसका नाम कीर्तिमान रखा गया। ऐसे नाम जन्म के तुरन्त बाद रखे जाते हैं।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥