श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 10: यमलार्जुन वृक्षों का उद्धार  »  श्लोक 11

 
श्लोक
देह: किमन्नदातु: स्वं निषेक्तुर्मातुरेव च ।
मातु: पितुर्वा बलिन: क्रेतुरग्ने: शुनोऽपि वा ॥ ११ ॥
 
शब्दार्थ
देह:—यह शरीर; किम् अन्न-दातु:—क्या यह मेरे स्वामी का है, जो मुझे इसके पालन के लिए धन देता है; स्वम्—या यह स्वयं मेरा है; निषेक्तु:—(या यह) वीर्य स्खलित करने वाले का है; मातु: एव—या (इसे) गर्भ में धारण करने वाली माता का है; च—तथा; मातु: पितु: वा—यह माता के पिता अर्थात् नाना का है क्योंकि कभी कभी नाना अपने नाती को गोद ले लेता है; बलिन:—या उसका है, जो बलपूर्वक इस शरीर को छीन लेता है; क्रेतु:—या इस शरीर को बँधुए मजदूर की तरह खरीद लेता है; अग्ने:—या अग्नि में (जला देता है); शुन:—या कुत्तों तथा गीधों का है, जो उसे खा जाते हैं; अपि—भी; वा—अथवा ।.
 
अनुवाद
 
 जीवित रहते हुए यह शरीर उसके अन्नदाता का होता है, या स्वयं का, अथवा पिता, माता या नाना का? क्या यह बलपूर्वक ले जाने वाले का, इसे खरीदने वाले स्वामी का या उन पुत्रों का होता है, जो इसे अग्नि में जला देते हैं? और यदि शरीर जलाया नहीं जाता तो क्या यह उन कुत्तों का होता है, जो इसे खाते हैं? आखिर इतने सारे दावेदारों में असली दावेदार कौन है? इसका पता लगाने के बजाय, पापकर्मों द्वारा इस शरीर का पालन करना अच्छा नहीं है।
 
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥