श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 10: यमलार्जुन वृक्षों का उद्धार  »  श्लोक 16

 
श्लोक
नित्यं क्षुत्क्षामदेहस्य दरिद्रस्यान्नकाङ्क्षिण: ।
इन्द्रियाण्यनुशुष्यन्ति हिंसापि विनिवर्तते ॥ १६ ॥
 
शब्दार्थ
नित्यम्—सदैव; क्षुत्—भूख से; क्षाम—निर्बल; देहस्य—शरीर का; दरिद्रस्य—गरीब व्यक्ति के; अन्न-काङ्क्षिण:—सदैव पर्याप्त भोजन की इच्छा रखने वाला; इन्द्रियाणि—इन्द्रियों को, जिनकी उपमा सर्पों से दी जाती है; अनुशुष्यन्ति—धीरे धीरे क्षीण से क्षीणतर होती जाती हैं; हिंसा अपि—अन्यों से ईर्ष्या करने की प्रवृत्ति भी; विनिवर्तते—कम हो जाती है ।.
 
अनुवाद
 
 दरिद्र व्यक्ति सदैव भूखा रहने और पर्याप्त भोजन की चाह करने के कारण धीरे धीरे क्षीण होता जाता है। अतिरिक्त बल न रहने से उसकी इन्द्रियाँ स्वत: शान्त पड़ जाती हैं। इसलिए दरिद्र मनुष्य हानिप्रद ईर्ष्यापूर्ण कार्य करने में अशक्त होता है। दूसरे शब्दों में, ऐसे व्यक्ति को उन तपस्याओं का फल स्वत: प्राप्त हो जाता है, जिसे सन्त-पुरुष स्वेच्छा से करते हैं।
 
तात्पर्य
 अनुभवी डाक्टरों का मत है कि मधुमेह रोग अत्यधिक खाने से और क्षय रोग अत्यल्प खाने से होता है। हमें न तो मधुमेही बनने, न ही यक्ष्माग्रस्त होने की कामना करनी चाहिए। यादव् अर्थ-प्रयोजनम्। हमें कम खाना चाहिए और इस शरीर को कृष्णभावनामृत में अग्रसर होने के लिए दुरुस्त रखना चाहिए। श्रीमद्भागवत में अन्यत्र (१.२.१०) कहा गया है—
कामस्य नेन्द्रियप्रीतिर्लाभो जीवेत यावता।

जीवस्य तत्त्वजिज्ञासा नार्थो यश्चेह कर्मभि: ॥

मानव जीवन का असली कार्य अपने को आत्म-साक्षात्कार के लिए स्वस्थ रखना है। मानव जीवन इन्द्रियों को वृथा हट्टा-कट्टा बनाने के लिए नहीं है, जिससे वह रोगग्रस्त हो और लड़ाई-झगड़े की भावना लेकर ईर्ष्यालु बने। किन्तु इस कलियुग में मानव सभ्यता का इतना विपथन हुआ है कि लोग व्यर्थ ही अर्थ-विकास में वृद्धि करके अधिकाधिक कसाईघर, मदिरालय तथा वेश्यालय खोल रहे हैं। इस तरह सारी सभ्यता चौपट हो रही है।

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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥