श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 10: यमलार्जुन वृक्षों का उद्धार  »  श्लोक 25

 
श्लोक
देवर्षिर्मे प्रियतमो यदिमौ धनदात्मजौ ।
तत्तथा साधयिष्यामि यद् गीतं तन्महात्मना ॥ २५ ॥
 
शब्दार्थ
देवर्षि:—परम सन्त देवर्षि नारद; मे—मेरा; प्रिय-तम:—सर्वाधिक प्रिय भक्त; यत्—यद्यपि; इमौ—ये दोनों (नलकूवर तथा मणिग्रीव); धनद-आत्मजौ—धनी पिता की सन्तान तथा अभक्त; तत्—देवर्षि के वचन; तथा—जिस प्रकार; साधयिष्यामि— सम्पन्न करूँगा (वे चाहते थे कि मैं यमलार्जुन के समक्ष आऊँ तो मैं ऐसा ही करूँगा); यत् गीतम्—जैसा कहा जा चुका है; तत्—वैसा; महात्मना—नारदमुनि द्वारा ।.
 
अनुवाद
 
 “यद्यपि ये दोनों युवक अत्यन्त धनी कुवेर के पुत्र हैं और उनसे मेरा कोई सम्बन्ध नहीं है परन्तु देवर्षि नारद मेरा अत्यन्त प्रिय तथा वत्सल भक्त है और क्योंकि उसने चाहा था कि मैं इनके समक्ष आऊँ अतएव इनकी मुक्ति के लिए मुझे ऐसा करना चाहिए।”
 
तात्पर्य
 नलकूवर तथा मणिग्रीव को वास्तव में न तो भक्ति से, न ही भगवान् के साक्षात्कार से कोई प्रयोजन था, क्योंकि यह कोई ऐसा-वैसा साधारण अवसर नहीं था। ऐसा नहीं है कि यदि कोई धनी हो, या विद्वान या उच्च कुल में जन्मा हो तो उसे भगवान् का साक्षात्कार हो ही जायगा। ऐसा असम्भव है। किन्तु, इस मामले में नारदमुनि की इच्छा थी कि नलकूवर तथा मणिग्रीव वासुदेव का प्रत्यक्ष दर्शन करें अतएव भगवान् ने अपने प्रिय भक्त नारदमुनि के वचनों को पूरा करना चाहा। यदि सीधे भगवान् से वर माँगने की बजाय किसी भक्त की कृपा प्राप्त की जाय तो बड़ी आसानी से सफलता प्राप्त हो सकती है। इसीलिए श्रील भक्तिविनोद ठाकुर की संस्तुति
है—वैष्णव ठाकुर तोमार कुक्कुर भुलिया जानह मोरे, कृष्ण से तोमार कृष्ण दिते पार। मनुष्य को चाहिए कि भक्त के पीछे निरन्तर कुत्ते के समान चलने की कामना करे। कृष्ण तो भक्त के हाथ बिके हुए हैं। अदुर्लभम् आत्मभक्तौ। अत: भक्त की कृपा के बिना कृष्ण तक सीधे पहुँचा भी नहीं जा सकता, उनकी सेवा करना तो दूर रहा। इसीलिए नरोत्तम दास ठाकुर ने गाया है—छाडिया वैष्णव-सेवा निस्तार पायेछे केबा—शुद्ध भक्त का दास बने बिना भवसागर से उद्धार नहीं हो सकता। हमारे गौड़ीय वैष्णव समाज में, रूप गोस्वामी का अनुसरण करते हुए हमारा पहला कार्य होता है प्रामाणिक आध्यात्मिक गुरु की शरण में जाना (आदौ गुर्वाश्रय:)।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥