श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 10: यमलार्जुन वृक्षों का उद्धार  »  श्लोक 36

 
श्लोक
नम: परमकल्याण नम: परममङ्गल ।
वासुदेवाय शान्ताय यदूनां पतये नम: ॥ ३६ ॥
 
शब्दार्थ
नम:—हम नमस्कार करते हैं; परम-कल्याण—आप परम कल्याण हैं; नम:—हमारा आपको नमस्कार; परम-मङ्गल—आप जो भी करते हैं वह उत्तम है; वासुदेवाय—वासुदेव को; शान्ताय—अत्यन्त शान्त को; यदूनाम्—यदुवंश के; पतये—नियन्ता को; नम:—हमारा नमस्कार है ।.
 
अनुवाद
 
 हे परम कल्याण, हम आपको सादर नमस्कार करते हैं क्योंकि आप परम शुभ हैं। हे यदुवंश के प्रसिद्ध वंशज तथा नियन्ता, हे वसुदेव-पुत्र, हे परम शान्त, हम आपके चरणकमलों में सादर नमस्कार करते हैं।
 
तात्पर्य
 परम-कल्याण शब्द महत्त्वपूर्ण है क्योंकि कृष्ण अपने किसी भी अवतार में साधुओं की रक्षा करने के लिए ही प्रकट होते हैं (परित्राणाय साधूनाम् )। साधुगण अर्थात् सन्त-पुरुष या भक्तगण सदैव असुरों द्वारा सताये जाते
हैं और कृष्ण विविध अवतारों में प्रकट होकर उन्हें राहत दिलाते हैं। उनका यह पहला कार्य है। यदि हम कृष्ण के जीवन का इतिहास पढ़ें तो पायेंगे कि अधिकांश जीवन में वे एक एक करके असुरों का वध करने में ही लगे रहे।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥