श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 10: यमलार्जुन वृक्षों का उद्धार  »  श्लोक 43

 
श्लोक
श्रीशुक उवाच
इत्युक्तौ तौ परिक्रम्य प्रणम्य च पुन: पुन: ।
बद्धोलूखलमामन्‍त्र्य जग्मतुर्दिशमुत्तराम् ॥ ४३ ॥
 
शब्दार्थ
श्री-शुक: उवाच—श्रीशुकदेव गोस्वामी ने कहा; इति उक्तौ—इस तरह भगवान् द्वारा आदेश दिये जाने पर; तौ—नलकूवर तथा मणिग्रीव; परिक्रम्य—परिक्रमा करके; प्रणम्य—नमस्कार करके; च—भी; पुन: पुन:—फिर फिर, बारम्बार; बद्ध-उलूखलम् आमन्त्र्य—ओखली से बँधे भगवान् से अनुमति लेकर; जग्मतु:—विदा हो गये; दिशम् उत्तराम्—अपने अपने गन्तव्यों को ।.
 
अनुवाद
 
 शुकदेव गोस्वामी ने कहा : इस प्रकार कहे जाने पर, उन दोनों देवताओं ने लकड़ी की ओखली से बँधे भगवान् की परिक्रमा की और उनको नमस्कार किया। भगवान् कृष्ण से अनुमति लेने के बाद वे अपने अपने धामों को वापस चले गये।
 
 
इस प्रकार श्रीमद्भागवत के दशम स्कन्ध के अन्तर्गत “यमलार्जुन वृक्षों का उद्धार” नामक दसवें अध्याय के भक्तिवेदान्त तात्पर्य पूर्ण हुए।
 
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥