श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 10: यमलार्जुन वृक्षों का उद्धार  »  श्लोक 8

 
श्लोक
श्रीनारद उवाच
न ह्यन्यो जुषतो जोष्यान्बुद्धिभ्रंशो रजोगुण: ।
श्रीमदादाभिजात्यादिर्यत्र स्त्री द्यूतमासव: ॥ ८ ॥
 
शब्दार्थ
श्री-नारद: उवाच—नारदमुनि ने कहा; न—नहीं है; हि—निस्सन्देह; अन्य:—दूसरा भोग; जुषत:—भोगने वाले का; जोष्यान्— भौतिक जगत की आकर्षक वस्तुएँ (खाने, सोने, मैथुन करने इत्यादि की विभिन्न किस्में); बुद्धि-भ्रंश:—बुद्धि को आकर्षित करने वाले ऐसे भोग; रज:-गुण:—रजोगुण द्वारा नियंत्रित; श्री-मदात्—सम्पत्ति की अपेक्षा; आभिजात्य-आदि:—चार भौतिक नियमों में से (सुन्दर स्वरूप, राजसी परिवार में जन्म, विद्वत्ता तथा धन-धान्य); यत्र—जहाँ; स्त्री—स्त्रियाँ; द्यूतम्—जुआ खेलना; आसव:—शराब ।.
 
अनुवाद
 
 नारदमुनि ने कहा : भौतिक भोग के समस्त आकर्षणों में से एक धन के प्रति आकर्षण सुन्दर शारीरिक रूप, उच्च कुल में जन्म तथा विद्वत्ता इन सब में से धन का आकर्षण, बुद्धि को अधिक भ्रमित करने वाला है। यदि कोई अशिक्षित व्यक्ति धन से गर्वित हो जाता है, तो वह अपना सारा धन शराब, स्त्रियों तथा जुआ खेलने के आनन्द में लगा देता है।
 
तात्पर्य
 प्रकृति के तीनों गुणों—सतो, रजो तथा तमो गुणों—में से लोग रजो तथा तमो गुणों द्वारा और विशेष रूप से रजोगुण द्वारा संचालित होते हैं। रजोगुण से संचालित होने पर मनुष्य इस भौतिक जगत में अधिकाधिक लिप्त होता जाता है। इसीलिए मानव जीवन रजो तथा तमो गुणों का दमन करने और सतो गुण को वर्धित करने के लिए मिला है।
तदा रजस्तमोभावा: कामलोभादयश्च ये।

चेत एतैरनाविद्धं स्थितं सत्त्वे प्रसीदति ॥

(भागवत १.२.१९) यही संस्कृति है कि रजो तथा तमो गुणों का दमन किया जाय। रजोगुण में जब मनुष्य को अपने धन का झूठा गर्व हो आता है, तो वह अपना धन केवल तीन चीजों में लगाता है—शराब में, स्त्रियों में तथा जुआ खेलने में। इस युग में विशेष रूप से देखा जा सकता है कि जिनके पास अनावश्यक धन है वे इन्हीं तीन वस्तुओं में उसे खर्चते हैं। पाश्चात्य सभ्यता में धन में अनावश्यक वृद्धि के कारण ये तीनों वस्तुएँ अत्यन्त प्रधान हैं। नारदमुनि ने मणिग्रीव तथा नलकूवर के विषय में इन सभी बातों पर विचार किया क्योंकि उन्होंने देखा कि वे अपने पिता कुवेर के धन पर इतना इतरा रहे हैं।

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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥