श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 11: कृष्ण की बाल-लीलाएँ  »  श्लोक 18

 
श्लोक
धूलिधूसरिताङ्गस्त्वं पुत्र मज्जनमावह ।
जन्मर्क्षं तेऽद्य भवति विप्रेभ्यो देहि गा: शुचि: ॥ १८ ॥
 
शब्दार्थ
धूलि-धूसरित-अङ्ग: त्वम्—तुम्हारा पूरा शरीर धूल से ढक गया है; पुत्र—मेरे बेटे; मज्जनम् आवह—आओ, स्नान करो तथा अपनी सफाई करो; जन्म-ऋक्षम्—जन्म का शुभ नक्षत्र; ते—तुम्हारे; अद्य—आज; भवति—है; विप्रेभ्य:—शुद्ध ब्राह्मणों को; देहि—दान में दो; गा:—गाएँ; शुचि:—शुद्ध होकर ।.
 
अनुवाद
 
 माता यशोदा ने आगे भी कृष्ण से कहा : हे पुत्र, दिन-भर खेलते रहने से तुम्हारा सारा शरीर धूल तथा रेत से भर गया है। अत: वापस आ जाओ, स्नान करो और अपनी सफाई करो। आज तुम्हारे जन्म के शुभ नक्षत्र से चाँद मेल खा रहा है, अत: शुद्ध होकर ब्राह्मणों को गौवों का दान करो।
 
तात्पर्य
 वैदिक संस्कृति की यह एक प्रथा है कि जब भी कोई शुभ उत्सव होता है, तो ब्राह्मणों को दान में बहुमूल्य गौवें दी जाती हैं। इसलिए माता यशोदा ने कृष्ण से प्रार्थना की कि खेलने में अधिक मन न लगा कर अब घर आकर दान देने में मन लगायें। यज्ञदानतप:कर्म न त्याज्यं कार्यमेव तत्। जैसाकि भगवद्गीता (१८.५)
में सलाह दी गई है यज्ञ, दान तथा तपस्या का कभी भी परित्याग नहीं करना चाहिए। यज्ञो दानं तपश्चैव पावनानि मनीषिणाम्—आध्यात्मिक जीवन में अत्यधिक बढ़े- चढ़े व्यक्ति को भी ये तीन कर्म नहीं छोडऩे चाहिए। अपना जन्मोत्सव मनाने के लिए इन तीनों (यज्ञ, दान या तप) में से एक या तीनों करना चाहिए।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥