श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 11: कृष्ण की बाल-लीलाएँ  »  श्लोक 19

 
श्लोक
पश्य पश्य वयस्यांस्ते मातृमृष्टान्स्वलङ्कृतान् ।
त्वं च स्‍नात: कृताहारो विहरस्व स्वलङ्कृत: ॥ १९ ॥
 
शब्दार्थ
पश्य पश्य—जरा देखो तो; वयस्यान्—समान उम्र के बालक; ते—तुम्हारी; मातृ-मृष्टान्—अपनी माताओं द्वारा नहलाये-धुलाये गये; सु-अलङ्कृतान्—सुन्दर आभूषणों से सज्जित; त्वम् च—तुम भी; स्नात:—नहाकर; कृत-आहार:—तथा भोजन करने के बाद; विहरस्व—उनके साथ खेलो-कूदो; सु-अलङ्कृत:—अच्छी तरह सजधज कर ।.
 
अनुवाद
 
 जरा अपनी उम्र वाले अपने सारे साथियों को तो देखो कि वे किस तरह अपनी माताओं द्वारा नहलाये-धुलाये तथा सुन्दर आभूषणों से सजाये गये हैं। तुम यहाँ आओ और स्नान करने, भोजन खाने तथा आभूषणों से अलंकृत होने के बाद फिर अपने सखाओं के साथ खेल सकते हो।
 
तात्पर्य
 सामान्यतया बालकों में स्पर्धा होती है। यदि एक मित्र कुछ कर लेता है, तो दूसरा भी कुछ करना चाहता है। इसलिए
माता यशोदा ने कृष्ण से कहा कि तुम्हारे साथी सजेधजे हैं जिससे वे भी अपने को उन्हीं की तरह सजा सकें।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥