श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 11: कृष्ण की बाल-लीलाएँ  »  श्लोक 24

 
श्लोक
मुक्त: कथञ्चिद्‌राक्षस्या बालघ्‍न्या बालको ह्यसौ ।
हरेरनुग्रहान्नूनमनश्चोपरि नापतत् ॥ २४ ॥
 
शब्दार्थ
मुक्त:—छूटा था; कथञ्चित्—किसी तरह; राक्षस्या:—राक्षसी पूतना के हाथों से; बाल-घ्न्या:—बालकों को मारने पर तुली; बालक:—विशेषतया बालक कृष्ण; हि—क्योंकि; असौ—वह; हरे: अनुग्रहात्—भगवान् की दया से; नूनम्—निस्सन्देह; अन: च—तथा छकड़ा; उपरि—बालक के ऊपर; न—नहीं; अपतत्—गिरा ।.
 
अनुवाद
 
 यह बालक कृष्ण, एकमात्र भगवान् की दया से किसी न किसी तरह राक्षसी पूतना के हाथों से बच सका क्योंकि वह उन्हें मारने पर उतारू थी। फिर यह भगवान् की कृपा ही थी कि वह छकड़ा इस बालक पर नहीं गिरा।
 
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥