श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 11: कृष्ण की बाल-लीलाएँ  »  श्लोक 26

 
श्लोक
यन्न म्रियेत द्रुमयोरन्तरं प्राप्य बालक: ।
असावन्यतमो वापि तदप्यच्युतरक्षणम् ॥ २६ ॥
 
शब्दार्थ
यत्—पुन:; न म्रियेत—नहीं मरा; द्रुमयो: अन्तरम्—दो वृक्षों के बीच; प्राप्य—बीच में होते हुए; बालक: असौ—वह बालक, कृष्ण; अन्यतम:—दूसरा बालक; वा अपि—अथवा; तत् अपि अच्युत-रक्षणम्—तब भी भगवान् द्वारा बचा लिया गया ।.
 
अनुवाद
 
 यहाँ तक कि किसी और दिन, न तो कृष्ण न ही उनके खिलाड़ी साथी उन दोनों वृक्षों के गिरने से मरे यद्यपि ये बालक वृक्षों के निकट या उनके बीच ही में थे। इसे भी भगवान् का अनुग्रह मानना चाहिये।
 
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥