श्रीमद् भागवतम
शब्द आकार

भागवत पुराण  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 11: कृष्ण की बाल-लीलाएँ  »  श्लोक 27

 
श्लोक
यावदौत्पातिकोऽरिष्टो व्रजं नाभिभवेदित: ।
तावद्बालानुपादाय यास्यामोऽन्यत्र सानुगा: ॥ २७ ॥
 
शब्दार्थ
यावत्—जब तक; औत्पातिक:—उत्पात मचाने वाले; अरिष्ट:—असुर; व्रजम्—यह गोकुल व्रजभूमि; न—नहीं; अभिभवेत् इत:—इस स्थान से चले जाँय; तावत्—तब तक; बालान् उपादाय—बालकों के लाभ के लिए; यास्याम:—हम चले जाँय; अन्यत्र—किसी दूसरी जगह; स-अनुगा:—अपने अनुयायियों समेत ।.
 
अनुवाद
 
 ये सारे उत्पात कुछ अज्ञात असुर द्वारा किये जा रहे हैं। इसके पूर्व कि वह दूसरा उत्पात करने आये, हमारा कर्तव्य है कि हम तब तक के लिए इन बालकों समेत कहीं और चले जायँ जब तक कि ये उत्पात बन्द न हो जायँ।
 
तात्पर्य
 उपानन्द ने प्रस्ताव रखा, “भगवान् विष्णु की कृपा से कृष्ण अनेकानेक घातक घटनाओं से सदा बचता रहा है। अब हमको चाहिए कि किसी और आक्रमणकारी असुर से मृत्यु का कारण उत्पन्न होने से पहले, हम इस स्थान को छोड़ कर किसी दूसरे स्थान चले जाँय जहाँ हम अविचलित रह कर विष्णु की पूजा कर सकें।” भक्त की यही अभिलाषा रहती है कि वह अविचल-भाव से भक्ति करता रहे। किन्तु हम देखते हैं कि नन्द महाराज तथा अन्य ग्वालों के बीच भगवान् कृष्ण के होते हुए भी उत्पात हो रहे थे। हाँ,
यह दूसरी बात है कि हर बार कृष्ण विजयी होते रहे। इससे हमें यही शिक्षा मिलती है कि तथाकथित उत्पातों से हमें विचलित नहीं होना चाहिए। हमारे कृष्णभावनामृत आन्दोलन के साथ अनेक उत्पात होते रहे हैं किन्तु हम अपना आगे बढऩा नहीं छोड़ सकते। उल्टे, संसार-भर में लोग इस आन्दोलन का बड़े उत्साह से स्वागत कर रहे हैं और दूने उत्साह से कृष्णभावनामृत विषयक साहित्य खरीद रहे हैं। इस तरह प्रोत्साहन तथा उत्पात दोनों रहते हैं। कृष्ण के समय में भी ऐसा ही था।
____________________________
 
All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥