श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 11: कृष्ण की बाल-लीलाएँ  »  श्लोक 29

 
श्लोक
तत्तत्राद्यैव यास्याम: शकटान् युङ्त मा चिरम् ।
गोधनान्यग्रतो यान्तु भवतां यदि रोचते ॥ २९ ॥
 
शब्दार्थ
तत्—इसलिए; तत्र—वहाँ; अद्य एव—आज ही; यास्याम:—चले चलें; शकटान्—सारी बैलगाडिय़ों को; युङ्क्त—जोत कर; मा चिरम्—देरी लगाये बिना; गो-धनानि—सारी गौवों को; अग्रत:—आगे आगे; यान्तु—चलने दें; भवताम्—आप सबों को; यदि—यदि; रोचते—अच्छा लगे ।.
 
अनुवाद
 
 अतएव हम आज ही तुरन्त चल दें। अब और अधिक प्रतीक्षा करने की आवश्यकता नहीं है। यदि आप सबों को मेरा प्रस्ताव मान्य हो तो हम अपनी सारी बैलगाडिय़ाँ तैयार कर लें और गौवों को आगे करके वहाँ चले जायें।
 
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥