श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 11: कृष्ण की बाल-लीलाएँ  »  श्लोक 37

 
श्लोक
एवं व्रजौकसां प्रीतिं यच्छन्तौ बालचेष्टितै: ।
कलवाक्यै: स्वकालेन वत्सपालौ बभूवतु: ॥ ३७ ॥
 
शब्दार्थ
एवम्—इस प्रकार; व्रज-ओकसाम्—सारे व्रजवासियों को; प्रीतिम्—हर्ष; यच्छन्तौ—प्रदान करते हुए; बाल-चेष्टितै:—बाल लीलाओं से; कल-वाक्यै:—मीठी तोतली बोली से; स्व-कालेन—समयानुसार; वत्स-पालौ—बछड़ों की रखवाली करने के लिए; बभूवतु:—बड़े हो गये ।.
 
अनुवाद
 
 इस तरह कृष्ण और बलराम छोटे बालकों की तरह क्रीड़ाएँ करते तथा तोतली बोली बोलते हुए व्रज के सारे निवासियों को दिव्य आनन्द देने लगे। समय आने पर वे बछड़ों की देखभाल करने के योग्य हो गये।
 
तात्पर्य
 ज्योंही कृष्ण तथा बलराम कुछ बड़े हुए त्योंही उन्हें बछड़ों की रखवाली का काम सौंप दिया गया। यद्यपि वे समृद्ध परिवार में उत्पन्न हुए थे तो भी उन्हें बछड़ों की रखवाली करनी पड़ती थी। यह शिक्षा की पद्धति थी। जो ब्राह्मण परिवारों में जन्म नहीं लेते थे उन्हें उच्च शिक्षा नहीं दी जाती थी। ब्राह्मणों को साहित्यिक उच्च शिक्षा दी जाती थी; क्षत्रियों को राज्य की रक्षा करने का प्रशिक्षण
मिलता था और वैश्यों को खेती करने तथा गौवों-बछड़ों की रखवाली करना सिखलाया जाता था। उन्हें झूठी शिक्षा प्राप्त करने के लिए स्कूल जाने और समय बर्बाद करने की आवश्यकता नहीं थी क्योंकि इससे बाद में बेरोजगारी ही बढ़ती। कृष्ण तथा बलराम ने अपने निजी आचरण से हमें शिक्षा दी। कृष्ण गायों की रखवाली करते और अपनी बाँसुरी बजाते तथा बलराम अपने हाथ में हल लेकर कृषि कार्यों की देखरेख करते।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥