श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 11: कृष्ण की बाल-लीलाएँ  »  श्लोक 45

 
श्लोक
तौ वत्सपालकौ भूत्वा सर्वलोकैकपालकौ ।
सप्रातराशौ गोवत्सांश्चारयन्तौ विचेरतु: ॥ ४५ ॥
 
शब्दार्थ
तौ—कृष्ण तथा बलराम; वत्स-पालकौ—मानो बछड़ों की रखवाली करने वाले; भूत्वा—बन कर; सर्व-लोक-एक- पालकौ—यद्यपि वे सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड के जीवों के पालनकर्ता हैं; स-प्रात:-आशौ—सुबह का नाश्ता करके; गो-वत्सान्—सारे बछड़ों को; चारयन्तौ—चराते हुए; विचेरतु:—इधर-उधर विचरण करने लगे ।.
 
अनुवाद
 
 असुर को मारने के बाद कृष्ण तथा बलराम ने अपना सुबह का नाश्ता (कलेवा) किया और बछड़ों की रखवाली करते हुए वे इधर-उधर टहलते रहे। भगवान् कृष्ण तथा बलराम ने जो सम्पूर्ण सृष्टि के पालक हैं, ग्वालबालों की तरह बछड़ों का भार सँभाला।
 
तात्पर्य
 परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम्। इस भौतिक जगत में कृष्ण का नित्य कार्य था दुष्कृतियों को मारना। इससे उनके दैनिक कार्य में बाधा नहीं आती थी क्योंकि
यह नित्य कर्म था। जब वे यमुना के तट पर बछड़े चराते तो नित्य ही दो-तीन घटनाएँ घटतीं किन्तु गम्भीर होने पर भी असुरों का वध उनका नित्य का कार्य बन गया था।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥