श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 11: कृष्ण की बाल-लीलाएँ  »  श्लोक 56

 
श्लोक
अथाप्यभिभवन्त्येनं नैव ते घोरदर्शना: ।
जिघांसयैनमासाद्य नश्यन्त्यग्नौ पतङ्गवत् ॥ ५६ ॥
 
शब्दार्थ
अथ अपि—यद्यपि उन्होंने आक्रमण करना चाहा; अभिभवन्ति—मारने में सक्षम हैं; एनम्—इस बालक को; न—नहीं; एव— निश्चय ही; ते—वे सब; घोर-दर्शना:—देखने में भयावने; जिघांसया—ईर्ष्या के कारण; एनम्—कृष्ण के; आसाद्य—पास आकर; नश्यन्ति—नष्ट हो जाते हैं (आक्रामक की मृत्यु होती है); अग्नौ—अग्नि में; पतङ्ग-वत्—कीटों के समान ।.
 
अनुवाद
 
 यद्यपि मृत्यु के कारणरूप दैत्यगण अत्यन्त भयावने थे किन्तु वे इस बालक कृष्ण को मार नहीं पाये। चूँकि वे निर्दोष बालकों को मारने आये थे इसलिए ज्योंही वे उनके निकट पहुँचे त्योंही वे उसी तरह मारे गये जिस तरह अग्नि पर आक्रमण करने वाले पतङ्गे मारे जाते हैं।
 
तात्पर्य
 नन्द महाराज ने सहज भाव से सोचा, “शायद इस बालक ने पूर्वजन्म में इन असुरों को मारा हो इसलिए इस जीवन में वे उससे ईर्ष्या करके उस पर आक्रमण कर रहे हैं। लेकिन कृष्ण अग्नि हैं और वे पतङ्गे हैं और अग्नि तथा पतङ्गों की लड़ाई में अग्नि ही विजयी होती है।” असुरों तथा भगवान्
की शक्ति के बीच सदैव युद्ध चलता रहता है। परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम् (भगवद्गीता ४.८)। जो भी भगवान् के नियंत्रण के विरुद्ध हो उसका वध जन्म-जन्मांतर किया जाना चाहिए। सामान्य प्राणी कर्म के वशीभूत हैं किन्तु भगवान् सदा ही असुरों पर विजय पाते हैं।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥