श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 11: कृष्ण की बाल-लीलाएँ  »  श्लोक 6

 
श्लोक
उलूखलं विकर्षन्तं दाम्ना बद्धं स्वमात्मजम् ।
विलोक्य नन्द: प्रहसद्वदनो विमुमोच ह ॥ ६ ॥
 
शब्दार्थ
उलूखलम्—ओखली को; विकर्षन्तम्—खींचते हुए; दाम्ना—रस्सी से; बद्धम्—बँधा हुआ; स्वम् आत्मजम्—अपने पुत्र कृष्ण को; विलोक्य—देख कर; नन्द:—नन्द महाराज; प्रहसत्-वदन:—इस अद्भुत बालक को देखकर मुसकाते चेहरे से; विमुमोच ह—उसे बन्धन से मुक्त कर दिया ।.
 
अनुवाद
 
 जब नन्द महाराज ने अपने पुत्र को रस्सी द्वारा लकड़ी की ओखली से बँधा और ओखली को घसीटते देखा तो वे मुसकाने लगे और उन्होंने कृष्ण को बन्धन से मुक्त कर दिया।
 
तात्पर्य
 नन्द महाराज को आश्चर्य हो रहा था कि कृष्ण की माता यशोदा ने अपने प्यारे बेटे को इस तरह से बाँधा हो। कृष्ण तो उससे प्रेम का आदान-प्रदान करता है, तो फिर वह इतनी क्रूर कैसे बन गई कि उसे लकड़ी की ओखली से बाँध दिया? इस प्रेम-व्यापार
को समझ कर नन्द हँस पड़े और उन्होंने कृष्ण को मुक्त कर दिया। दूसरे शब्दों में, जिस तरह भगवान् कृष्ण जीव को सकाम कर्मों से बाँधते हैं उसी तरह वे माता यशोदा तथा नन्द महाराज को वात्सल्य-प्रेम में बाँधते हैं। यही उनकी लीला है।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥