श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 11: कृष्ण की बाल-लीलाएँ  »  श्लोक 9

 
श्लोक
दर्शयंस्तद्विदां लोक आत्मनो भृत्यवश्यताम् ।
व्रजस्योवाह वै हर्षं भगवान् बालचेष्टितै: ॥ ९ ॥
 
शब्दार्थ
दर्शयन्—दिखलाते हुए; तत्-विदाम्—कृष्ण के कार्यों को समझने वाले पुरुषों को; लोके—सारे जगत में; आत्मन:—अपने आप को; भृत्य-वश्यताम्—अपने दासों या भक्तों के आदेशों का पालन करने के लिए तैयार रहने वाले; व्रजस्य—व्रजभूमि के; उवाह—सम्पन्न किया; वै—निस्सन्देह; हर्षम्—आनन्द; भगवान्—भगवान्; बाल-चेष्टितै:—बच्चों के जैसे कार्यों द्वारा ।.
 
अनुवाद
 
 भगवान् कृष्ण ने अपने कार्यकलापों को समझने वाले संसार-भर के शुद्ध भक्तों को दिखला दिया कि किस तरह वे अपने भक्तों अर्थात् दासों द्वारा वश में किये जा सकते हैं। इस तरह अपनी बाल-लीलाओं से उन्होंने व्रजवासियों के हर्ष में वृद्धि की।
 
तात्पर्य
 यह एक अन्य दिव्य हास्य-रस है कि कृष्ण अपने भक्तों के आनन्द-वर्धन के लिए बाल-लीलाएँ करते थे। वे इन लीलाओं को न केवल व्रजभूमि के निवासियों को दिखलाते थे अपितु अन्यों को भी जो उनकी बहिरंगा शक्ति तथा ऐश्वर्य
पर मुग्ध हो जाते थे। किन्तु अन्तरंगी भक्तों को जो केवल कृष्ण-प्रेम में निमग्न रहते थे तथा बाह्य भक्तों को जो उनकी असीम शक्ति पर मुग्ध रहते थे कृष्ण की अपने दासों के वश में रहने की इच्छा का पता चला।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥