श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 12: अघासुर का वध  »  श्लोक 12

 
श्लोक
यत्पादपांसुर्बहुजन्मकृच्छ्रतो
धृतात्मभिर्योगिभिरप्यलभ्य: ।
स एव यद् दृग्विषय: स्वयं स्थित:
किं वर्ण्यते दिष्टमतो व्रजौकसाम् ॥ १२ ॥
 
शब्दार्थ
यत्—जिसके; पाद-पांसु:—चरणकमलों की धूल; बहु-जन्म—अनेक जन्मों में; कृच्छ्रत:—योग, ध्यान आदि के लिए कठिन तपस्या करने से.; धृत-आत्मभि:—मन को वश में रखने वालों के द्वारा; योगिभि:—ऐसे योगियों द्वारा (ज्ञानयोगी, राजयोगी, ध्यानयोगी इत्यादि); अपि—निस्सन्देह; अलभ्य:—प्राप्त न किया जा सकने वाली; स:—भगवान्; एव—निस्सन्देह; यत्-दृक्- विषय:—साक्षात् दर्शन की वस्तु बन गया है; स्वयम्—स्वयं; स्थित:—उनके समक्ष उपस्थित; किम्—क्या; वर्ण्यते—वर्णन किया जा सकता है; दिष्टम्—भाग्य के विषय में; अत:—इसलिए; व्रज-ओकसाम्—व्रजभूमि वृन्दावन के वासियों के ।.
 
अनुवाद
 
 भले ही योगी अनेक जन्मों तक यम, नियम, आसन तथा प्राणायाम द्वारा जिनमें से कोई भी सरलता से नहीं किया जा सकता है, कठोर से कठोर तपस्या करें फिर भी समय आने पर जब इन योगियों को मन पर नियंत्रण करने की सिद्धि प्राप्त हो जाती है, तो भी वे भगवान् के चरणकमलों की धूल के एक कण तक का आस्वाद नहीं कर सकते। तो भला व्रजभूमि वृन्दावन के निवासियों के महाभाग्य के विषय में क्या कहा जाय जिनके साथ साथ साक्षात् भगवान् रहे और जिन्होंने उनका प्रत्यक्ष दर्शन किया?
 
तात्पर्य
 हम वृन्दावनवासियों के महाभाग्य का केवल अनुमान लगा सकते हैं। यह वर्णन कर पाना असम्भव है
कि किस तरह अनेकानेक जन्मों के पुण्यकर्मों के परिणामस्वरूप वे इतने भाग्यशाली बन सके।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥