श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 12: अघासुर का वध  »  श्लोक 26

 
श्लोक
तावत् प्रविष्टास्त्वसुरोदरान्तरं
परं न गीर्णा: शिशव: सवत्सा: ।
प्रतीक्षमाणेन बकारिवेशनं
हतस्वकान्तस्मरणेन रक्षसा ॥ २६ ॥
 
शब्दार्थ
तावत्—तब तक; प्रविष्टा:—सभी बालक घुस गये; तु—निस्सन्देह; असुर-उदर-अन्तरम्—उस असुर के पेट के भीतर; परम्— लेकिन; न गीर्णा:—निगले नहीं जा सके; शिशव:—सारे बालक; स-वत्सा:—अपने अपने बछड़ों समेत; प्रतीक्षमाणेन— प्रतीक्षारत; बक-अरि—बकासुर के शत्रु का; वेशनम्—प्रवेश; हत-स्व-कान्त-स्मरणेन—वह असुर अपने मृत सम्बन्धियों के बारे में सोच रहा था और तब तक संतुष्ट नहीं होगा जब तक कृष्ण मर न जाय; रक्षसा—असुर द्वारा ।.
 
अनुवाद
 
 जब तक कि कृष्ण सारे बालकों को रोकने के बारे में सोचें, तब तक वे सभी असुर के मुख में घुस गये। किन्तु उस असुर ने उन्हें निगला नहीं क्योंकि वह कृष्ण द्वारा मारे गये अपने सम्बन्धियों के विषय में सोच रहा था और अपने मुख में कृष्ण के घुसने की प्रतीक्षा कर रहा था।
 
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥